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कुवैत में राजनीतिक संकट : अमीर ने भंग की संसद, कर्मचारियों को वेतन देने के लिए भी नहीं बचे पैसे

कुवैत। कभी खाड़ी युद्ध की वजह बने इस अमीर देश के राजनीतिक हालात इन दिनों चर्चाओं में हैं। हाल ही में संवैधानिक संकट के कारण ये पेट्रोलियम उत्पादक गल्फ कंट्री अब सुर्खियों में आ गया है। यहां के अमीर और प्रधानमंत्री शेख मेशाल अल-अहमद अल-सबा ने चुनाव के कुछ हफ्ते बाद ही संसद को भंग कर संविधान के कुछ हिस्सों को 4 साल के लिए निलंबित कर दिया है। शुक्रवार को एक टेलीविजन भाषण में उन्होंने इसका ऐलान किया। अमीर ने कहा कि इस दौरान लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सभी पहलुओं का अध्ययन किया जाएगा। अगर लोकतांत्रिक नजरिए से देखा जाए तो इस तरह से चुनी हुई सरकार को भंग करने के बाद इस देश में एक तरह की डिक्टेटरशिप (तानाशाही) लागू हो गई है।

ये कहा था अमीर ने अपने संबोधन में

कुवैत के अमीर ने नेशनल टीवी पर अपने संबोधन के दौरान देश की जनता को संबोधित करते हुए कहा कि “कुवैत इन दिनों कठिन दौर से गुजर रहा है, जिससे देश को बचाने और अपने बड़े हितों को सुरक्षित करने के लिए कठिन निर्णय लेने में झिझक या देरी की कोई गुंजाइश नहीं है।” … कुवैत के बारे में कहा जाता था कि वहां का लोकतंत्र अन्य खाड़ी देशों जैसे सऊदी अरब, ओमान, कतर और ईरान जैसे अन्य देशों की तुलना में ज्यादा प्रभावी है। ऐसे में संसद को भंग करना यहां के लोकतांत्रिक हितों पर कुठाराघात के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि यहां के अमीर ने दावा किया है कि इस नए फैसले से जनहित से जुड़े मुद्दे किसी भी तरह से प्रभावित नहीं होंगे।

7 अप्रैल को पूर्व प्रधानमंत्री ने दिया था इस्तीफा

कुवैत के अमीर शेख अहमद अब्दुल्ला ने हाल ही में अल-अहमद अल-सबा को देश का नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया था। ये निर्णय 7 अप्रैल को पूर्व प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद सबा अल-सलेम अल-सबा के इस्तीफे के बाद लिया गया था। 4 अप्रैल को नई संसद के चुनाव के बाद, शेख मोहम्मद ने 6 अप्रैल को अपने मंत्रिमंडल का इस्तीफा सौंप दिया था।

कुवैत में चलती है सीमित राजशाही

कुवैत में भी अरब देशों का तरह अमीर (शेख) के नेतृत्व वाली राजशाही व्यवस्था है। लेकिन यहां की जनरल असेंबली अरब देशों के मुकाबले वहां की राजनीति में ज्यादा शक्तिशाली है। पिछले कुछ समय से कुवैत में घरेलू राजनीतिक संकट चल रहा है। देश की कैबिनेट और जनरल असेंबली के बीच कई मुद्दों पर टकराव है, जिस कारण से देश को नुकसान हुआ है। देश का वेलफेयर सिस्टम इसका बड़ा मुद्दा रहा है। इसके कारण कुवैत की सरकार कर्ज नहीं ले पा रही है। यही वजह है कि तेल से भारी मुनाफे के बावजूद सरकारी खजाने में कर्मचारियों को वेतन देने के लिए पैसे भी नहीं बचे हैं।

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