
राज्य संग्रहालय में संचालनालय पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय द्वारा हलधर बलराम पर आधारित ‘कृषि संस्कृति में बलराम’ एग्जीबिशन में लगाई गई। इस प्रदर्शनी में भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि और कृषि उपकरणों के क्रमानुबद्ध विकास के साथ ही बलराम की प्राचीन प्रतिमाओं के फोटोग्राफ्स शामिल किए गए। इनमें भारत के साथ ही अमेरिका जैसे दक्षिण-पूर्वी देशों के संग्रहालयों में मौजूद प्रतिमाओं, भित्ति एवं पोथी के 25 से अधिक फोटोग्राफ्स को शामिल किया गया।
इस प्रदर्शनी को दर्शक राज्य संग्रहालय की प्रदर्शनी दीर्घा में 30 अगस्त तक कार्यालयीन समय में देख सकते हैं। इसमें हाथों में हल लिए भगवान बलराम की विभिन्न प्रतिमाएं हैं। प्रदर्शनी में मिली जानकारी के मुताबिक, बलराम ने आवेश में आकर आयुध हल से यमुना नदी को उसके मूल प्रवाह से खींच लिया था।
ग्रीक यवन शासकों ने कृष्ण- बलराम पर तैयार कराए थे सिक्के
मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत पर ग्रीक यवनों ने आक्रमण कर अपनी सत्ता स्थापित कर ली थी। ये ग्रीक यवन शासक भी भारतीय संस्कृति से प्रभावित हुए और अपनी मुद्राओं पर भारतीय जनमानस में रचे-बसे देवी- देवताओं को स्थान दिया, अगाथोक्लिस प्रथम ने अपनी मुद्राओं पर भारतीय जनमानस के देवता बलराम का अंकन कराया। अगाथोक्लिस प्रथम के सिक्कों पर अंकित यह अंकन दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में किया गया।
प. बंगाल से मिली कांस्य प्रतिमा
कांस्य से बनी हलधर बलराम की प्रतिमा प. बंगाल के राजवाड़ी जिले के सीरसोल से प्राप्त हुई। इस कांस्य प्रतिमा में विष्णु अवतार बलराम दाएं हाथ में गदा और पदम एवं बाएं हाथ में शंख और हल धारण किए हुए पद्मपीठ पर हैं। यह प्रतिमा 14वीं शताब्दी की है।
हरियाणा से मिला 2000 ईसा पूर्व का मृण्मयी हल
हरियाणा के फतेहाबाद जिले के बनावली से हड़प्पा कालीन मृण्मयी हल प्राप्त हुआ था। अनुमान है कि यह मृण्मयी हल करीब 2000 ईसा पूर्व का है। वहीं, पाकिस्तान के सिंध के लरकाना जिले में मोहनजोदड़ो से ताम्रपाषाण कालीन मृण्मयी हल प्राप्त हुआ। यह हल भी 2000 ईसा पूर्व का है। स्वतंत्रता से पहले सिंध भारत का ही हिस्सा था। हल का यह मृण्मयी प्रतिरूप तत्कालीन कृषि एवं कृषि कार्य में उपयोग में लाए जाने वाले हल के स्वरूप का अनुमान कराता है। यह हल 6, 8 व 12 बैलों से जोते जाते थे।