कांटों वाला सेही और शल्कधारी पैंगोलिन के कारण अब सागर का डॉ. अंडबेडकर अभयारण्य में सुर्खियों में
अनिल दुबे, सागर। बुंदेलखंड के जंगलों में भालू और तेंदुए तो पहले से हैं, लेकिन अब यहां दो और वन्यजीव चर्चा में हैं। एक के शरीर पर कांटों का कवच है, तो दूसरा खतरा भांपते ही खुद को लोहे की गेंद जैसा गोल कर लेता है। बात हो रही है सेही और पैंगोलिन की। इन वन्यजीवों की मौजूदगी ने 25,864 हेक्टेयर में फैले डॉ. भीमराव अंबेडकर अभयारण्य को सुर्खियों में ला दिया है। यहां की कहानी कुछ ऐसी है कि दिन में जंगल शांत दिखाई देता है, लेकिन रात होते ही पेड़ों, चट्टानों, नालों और बिलों के आसपास वन्यजीवों की अपनी दुनिया आबाद हो जाती है। कैमरा ट्रैप ने जंगल की इसी छिपी दुनिया की कुछ झलकियां सामने रखी हैं।
बीते साल मिली थी 25वें अभयारण्य की पहचान
प्रदेश सरकार ने 11 अप्रैल 2025 को अधिसूचना जारी कर डॉ. भीमराव अंबेडकर अभयारण्य को राज्य के 25वें अभयारण्य के रूप में स्वीकृति दी थी। उत्तर वन मंडल सागर के अंतर्गत शाहगढ़, बंडा, मालथौन और बांदरी वन परिक्षेत्रों के जंगलों को समेटे यह क्षेत्र प्राकृतिक संपदा और वन्यजीव विविधता के लिहाज से महत्वपूर्ण है। धसान नदी और उससे जुड़ी सहायक नदियों के जलग्रहण क्षेत्र, पथरीली पहाड़ियों, घनी झाड़ियों और प्राकृतिक बिलों के कारण यहां वन्यजीवों को अनुकूल वातावरण मिलता है। यहां से वन्यजीवों की आवाजाही उत्तर प्रदेश के ललितपुर के जंगलों तक होने की जानकारी भी सामने आती रही है।
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जंगल में छिपा ‘शल्कधारी सिकंदर’ पैंगोलिन
पैंगोलिन ऐसा जीव है, जो पहली नजर में किसी बख्तरबंद प्राणी जैसी लग सकती है। इसके शरीर पर कठोर शल्क होते हैं। खतरा महसूस होते ही यह अपने शरीर को गोल कर लेता है और शल्कों को सुरक्षा कवच की तरह इस्तेमाल करता है। मगर इसका यह कवच इंसान के लालच से हमेशा रक्षा नहीं कर पाता। स्थानीय ग्रामीणों की सूचना पर दिसंबर 2022 में इस क्षेत्र में पैंगोलिन की मौजूदगी सामने आने के बाद वन विभाग ने उसका सुरक्षित रेस्क्यू कर उसे जंगल में छोड़ने की कार्रवाई की थी। इसके बाद शाहगढ़ और बरायठा के जंगलों में इसकी गतिविधियों पर नजर रखी गई।
सबसे अधिक तस्करी किए जाने वाले स्तनधारियों में शामिल
कैमरा ट्रैप के माध्यम से पैंगोलिन की हलचल और बिलों से जुड़ी गतिविधियों के संकेत दर्ज किए गए। हालिया वन्यजीव सर्वेक्षण में पैंगोलिन की मौजूदगी को विशेषज्ञ महत्वपूर्ण उपलब्धि मान रहे हैं। पैंगोलिन के शरीर पर मौजूद शल्क उसे तस्करों के निशाने पर भी ला देते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके अवैध व्यापार के कारण यह दुनिया के सबसे अधिक तस्करी किए जाने वाले स्तनधारियों में शामिल है। पैंगोलिन के दांत नहीं होते। वह अपने मजबूत पंजों से दीमक और चींटियों के ठिकाने खोदता है तथा अपनी लंबी, चिपचिपी जीभ से उन्हें खाता है। दोनों जीवों की खान-पान की यह अलग-अलग आदतें जंगल के पारिस्थितिक संतुलन में उनकी विशिष्ट भूमिका को दर्शाती हैं।
कांटों वाला सेही भी कम दिलचस्प नहीं
सेही किसी कांटेदार सुरक्षा गार्ड से कम नहीं। इसके शरीर पर लंबे, नुकीले कांटे होते हैं, जो खतरे के समय इसकी रक्षा करते हैं। यह आमतौर पर रात में सक्रिय रहती है। दिन के समय पथरीली गुफाओं, चट्टानों की दरारों और गहरे बिलों में छिपकर आराम करती है।बरायठा और आसपास के क्षेत्रों में वन विभाग के सर्वेक्षण, रेस्क्यू अभियानों और कैमरा ट्रैप के दौरान सेही की मौजूदगी के प्रमाण सामने आए थे। रात के समय भोजन की तलाश में घूमती सेही की तस्वीरें और वीडियो दर्ज किए गए। बीला और धसान नदी के जलग्रहण क्षेत्रों के आसपास ग्रामीणों तथा वनकर्मियों इसके भोजन में जड़ें, कंद-मूल, फल, वनस्पतियां और
भालू-तेंदुए के साथ अन्य वन्यजीव
यहां भालू, तेंदुआ, लकड़बग्घा, हिरण, नीलगाय, चीतल, चिंकारा, सियार, लोमड़ी, जंगली सुअर, जंगली बिल्ली, खरगोश, चौसिंगा, गोह, कबर बिज्जू और नेवले जैसे वन्यजीवों की मौजूदगी की जानकारी मिलती रही है।पक्षियों में मोर के अलावा गिद्धों की विभिन्न प्रजातियां भी इस क्षेत्र की प्राकृतिक विविधता का हिस्सा हैं। नदी और जलस्रोतों से जुड़े हिस्सों में मगरमच्छों की मौजूदगी भी बताई जाती है। पैंगोलिन वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 में संरक्षित है। इसका शिकार, अवैध कब्जा या तस्करी गंभीर अपराध है और कानून के तहत कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है। सेही भी संरक्षित वन्यजीव है। उसके शिकार और अवैध व्यापार पर रोक लगाने के लिए सतर्कता जरूरी है।
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अभयारण्य में सेही और पैंगोलिन की मौजूदगी महत्वपूर्ण
इस बारे में सागर के उत्तर वन मंडल अधिकारी चंद्रशेखर सिंह का कहना है कि अभयारण्य क्षेत्र में सेही और पैंगोलिन जैसे वन्यजीवों की मौजूदगी महत्वपूर्ण है। करीब 25,864 हेक्टेयर के इस वन क्षेत्र में भालू और तेंदुए सहित अनेक वन्यजीव पाए जाते हैं। दुर्लभ प्रजातियों की गतिविधियों पर नजर रखना और उनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखना वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से अहम है।






















