
सिंग्रामपुर मध्य प्रदेश के दमोह जिले की जबेरा तहसील का एक ऐतिहासिक गांव है, जो गोंडवाना साम्राज्य की समृद्ध विरासत और राजा दलपत शाह तथा रानी दुर्गावती की यादों को संजोए हुए है। यह स्थल एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक केंद्र है, जहां गोंडवाना साम्राज्य के शासकों ने शासन किया और मुगलों से अपने राज्य की रक्षा की। सिंग्रामपुर का किला और सिंगौरगढ़ किला रानी दुर्गावती की वीरता और संघर्ष का प्रतीक है। साथ ही यहां राजा दलपत शाह की समाधि और रानी दुर्गावती की विशाल प्रतिमा स्थापित है, जो इस क्षेत्र की ऐतिहासिक महत्ता को जीवित रखती हैं।
बता दें कि रानी दुगार्वती की जयंती पर शनिवार को मध्य प्रदेश के दमोह जिले स्थित उनकी जन्मस्थली सिंग्रामपुर में मोहन कैबिनेट की बैठक की गई है।
कैसे रखा सिंग्रामपुर नाम ?
सिंग्रामपुर का ऐतिहासिक महत्व इस युद्ध से गहरा जुड़ा हुआ है। सिंग्रामपुर का नाम वास्तव में “संग्राम” से लिया गया है, जिसका हिंदी में अर्थ “युद्ध” होता है और यह नाम रानी दुर्गावती और मुगल सेनापति आसफ खान के बीच हुए अंतिम युद्ध से जुड़ा हुआ है।
सिंग्रामपुर का ऐतिहासिक महत्व
सिंग्रामपुर, जो वर्तमान में दमोह और जबलपुर के बीच स्थित है, कभी गोंडवाना साम्राज्य की राजधानी थी। इस स्थान के पास सिंगौरगढ़ किला स्थित है, जिसे रानी दुर्गावती के शासन के समय में गोंडवाना साम्राज्य की महत्वपूर्ण किलाबंदी के रूप में जाना जाता था। जो 1500 से 1564 तक अस्तित्व में था। इस साम्राज्य के अंतर्गत 52 किले थे। इस साम्राज्य के शासक जैसे संग्राम शाह, दलपत शाह और रानी दुर्गावती ने क्षेत्र की रक्षा की और मुगलों के आक्रमणों का विरोध किया। सिंग्रामपुर का सिंगौरगढ़ किला इस संघर्षों का गवाह है और रानी दुर्गावती के युद्धों का महत्वपूर्ण स्थल था।
सिंग्रामपुर तक कैसे पहुंचें?
सिंग्रामपुर तक सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है। यह दमोह मुख्यालय से लगभग 54 किलोमीटर और जबलपुर से 51 किलोमीटर दूर स्थित है। भोपाल से सागर होते हुए दमोह और फिर सिंग्रामपुर पहुंचा जा सकता है। वहीं जबलपुर से नर्मदापुरम होते हुए भी इस ऐतिहासिक स्थल तक पहुंचा जा सकता है।
राजा दलपत शाह और रानी दुर्गावती का योगदान
राजा दलपत शाह गोंडवाना साम्राज्य के 49वें शासक थे। उन्होंने सिंगौरगढ़ किले से अपने साम्राज्य की शाही सत्ता का संचालन किया। उनका शासनकाल साम्राज्य के इतिहास में महत्वपूर्ण था और उनका योगदान आज भी गोंडवाना साम्राज्य की समृद्ध विरासत के रूप में याद किया जाता है। उनकी समाधि सिंग्रामपुर के पास स्थित है, जो इस क्षेत्र के ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित करती है।
राजा दलपत शाह की असामयिक मृत्यु के बाद, रानी दुर्गावती ने 1550 से 1564 तक साम्राज्य की बागडोर संभाली। रानी दुर्गावती, जो महोबा के चंदेल राजवंश के राजा कीरत सिंह चंदेला की एकमात्र संतान थीं। उन्होंने गोंडवाना राज्य की रक्षा करते हुए अपने राज्य को मजबूत किया। उनके शासनकाल में साम्राज्य का रक्षात्मक ढांचा मजबूत किया गया। उन्होंने अपने राज्य की स्वतंत्रता के लिए मुगलों के खिलाफ संघर्ष किया।
रानी दुर्गावती की जयंती 5 अक्टूबर को मनाई जाती है। रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को कालिंजर किले (वर्तमान बांदा जिला) में हुआ था। रानी दुर्गावती का विवाह संग्राम शाह के पुत्र दलपत शाह से 1542 में हुआ था और रानी ने उनकी असामयिक मृत्यु के बाद गोंडवाना साम्राज्य की रक्षा की। रानी दुर्गावती की महानता केवल उनके शासनकाल में नहीं, बल्कि उनके साहस और बलिदान में भी छिपी है। उन्होंने मुगल साम्राज्य के खिलाफ संघर्ष करते हुए सिंगौरगढ़ किला में अपने प्राणों की आहुति दी।
सिंग्रामपुर के ऐतिहासिक स्थल और उनका महत्व
सिंगौरगढ़ किला: रानी दुर्गावती के समय का यह किला गोंडवाना साम्राज्य की सैन्य शक्ति का प्रतीक था और युद्ध के समय मुगलों से बचाव का मुख्य केंद्र था।
राजा दलपत शाह की समाधि: सिंग्रामपुर के पास स्थित राजा दलपत शाह की समाधि गोंडवाना साम्राज्य के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
रानी दुर्गावती की प्रतिमा: सिंग्रामपुर में रानी दुर्गावती की विशाल प्रतिमा स्थापित की गई है, जो उनकी वीरता और साहस की याद दिलाती है।