
न्यूसी समैया, ज्योतिषाचार्य एवं वास्तु शास्त्राचार्य
हमारी सनातन संस्कृति और भारतीय परंपरा में विविध प्रकार के त्योहार लगभग वर्षभर ही मनाए जाते हैं। हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है कि हर त्योहार के पौराणिक, सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व के साथ-साथ इनके पीछे कोई न कोई वैज्ञानिकता अवश्य ही छिपी होती है। इसी कड़ी में एक त्योहार आता है होली! यूं तो होली रंगों और उत्साह का त्योहार माना जाता है, परंतु इसे मानने के धार्मिक कारण के साथ-साथ कुछ वैज्ञानिक तथ्य भी हैं।
राजा हिरणकश्यप और भक्त प्रहलाद से संबंधित होली की पौराणिक कथा तो हम सबको पता ही है। अब यहां हम बात करेंगे उसकी वैज्ञानिकता की। जानेंगे, क्या कारण है कि हम इसे इतने उमंग और उत्साह से ढोल नगाड़ों और प्रफुल्लित करने वाले संगीत के साथ मनाते हैं। होली के पहले के आठ दिनों को अर्थात फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से लेकर होलिका दहन तक की अवधि को होलाष्टक कहा जाता है। इन दिनों समस्त मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं, क्योंकि ज्योतिषशास्त्र के अनुसार इन आठों दिनों में क्रमशः चंद्रमा, सूर्य, शनि ,शुक्र ,गुरु, बुध, मंगल और राहु अपने उग्र रूप में रहते हैं। मनुष्य के मानसिक व्यवहार पर ग्रहों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है और ग्रहों के प्रभाव से मनुष्य इन दिनों में मनोवैज्ञानिक रूप से कुछ क्षीण हो जाते हैं। एक नकारात्मकता सी आने लगती है। अतः उनको उस स्थिति से उबारने के लिए और नई ऊर्जा का संचार करने के लिए होली का त्यौहार हर्ष उल्लास और उत्साह पूर्वक मनाया जाता है, जिससे वापस सभी ऊर्जावान और प्रफुल्लित महसूस कर सकें। इसके लिए रंगों और संगीत द्वारा पूरे वातावरण को उमंग, उत्साह और आनंद से भर दिया जाता है।
अगर मौसम और स्वास्थ की बात करें तो होली का त्योहार साल में एक ऐसे समय पर आता है, जब मौसम में बदलाव के कारण शरीर में स्फूर्ति नहीं होती है। या यूं कहें कि अचानक मौसम में गर्माहट आने से एक सुस्ती और थकान महसूस होती है। वातावरण में उत्साह लाने के लिए होली में एक रंगबिरंगा और उल्लासपूर्ण माहौल तैयार किया जाता है। इस मौसम में बजाया जाने वाला संगीत भी उल्लास से भरा होता है। कलर थैरेपी से आधुनिक वैज्ञानिकों ने लोगों के मनोवैज्ञानिक व्यवहार में अनेक सकारात्मक प्रभाव देखे हैं। हर एक रंग का मनुष्य के मन पर एक अलग प्रभाव पड़ता है, जिनके द्वारा उनके मानसिक व्यवहार का संतुलन किया जाता है।
योग आश्रम के डॉक्टर प्रधान के अनुसार जब होली में ढाक, पलाश, टेसू आदि के फूलों से तैयार किया गया पानी और प्राकृतिक शुद्ध अबीर और गुलाल शरीर पर लगता है तो वह एक नई ताजगी प्रदान करता है। अनेक जैव वैज्ञानिकों का मानना है कि अबीर शरीर की त्वचा को उत्तेजित करते हैं और त्वचा में समाकर शरीर के आयन मंडल को मजबूती प्रदान करने के साथ-साथ स्वास्थ्य को भी बेहतर करते हैं। यह प्राकृतिक तौर पर सुंदरता में निखार लाते हैं।
आज म्यूजिक थैरेपी पर भी नित नई रिसर्च हो रही है। यह थैरेपी विभिन्न रोगों से लड़ने में बहुत ही मददगार साबित हो रही है। इससे न सिर्फ मानसिक रोग, बल्कि ब्लड प्रेशर आदि में भी बहुत सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे हैं। अतः होली पर बजने वाला उमंग और उत्साह से भरा हुआ संगीत मनुष्य में नई ऊर्जा ताजगी और स्फूर्ति भर देता है।
इसी प्रकार होलिका दहन का भी एक वैज्ञानिक कारण है। शरद ऋतु की समाप्ति और वसंत ऋतु के आगमन पर यह काल पर्यावरण और शरीर में बैक्टीरिया की वृद्धि को बढ़ा देता है। जब होली जलाई जाती है, तब करीब 145 डिग्री फारेनहाइट तक तापमान बढ़ता है और जब लोग जलती हुई होलिका की परिक्रमा करते हैं तो होलिका से निकलता ताप शरीर के आसपास के पर्यावरण में मौजूद बैक्टीरिया को नष्ट कर देता है। इस प्रकार यह शरीर तथा पर्यावरण को स्वच्छ करने का कार्य करता है।
अतः अब हम इस निष्कर्ष पर आसानी से पहुंच सकते हैं कि होली का त्यौहार न सिर्फ मनुष्य में सामाजिक सौहार्द बढ़ाता है, बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक असर डालता है। यह पारंपरिक धार्मिक त्योहार होने के साथ-साथ वैज्ञानिक महत्व भी रखता है।
(न्यूसी समैया ने इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोलॉजी (भारतीय विद्या भवन) नई दिल्ली से ज्योतिष अलंकार की डिग्री ली है। ज्योतिष शास्त्र विशेषज्ञ, ज्योतिष शिरोमणि सम्मान से पुरस्कृत न्यूसी 25 वर्षों से इस क्षेत्र में काम कर रही हैं। वह स्कूल ऑफ एस्ट्रोलॉजी की डायरेक्टर भी हैं।)
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