मोहन भागवत के बयान पर पांचजन्य का समर्थन, लिखा- स्वार्थ के लिए मंदिर का प्रचार गलत; ऑर्गनाइजर का मत अलग, 3 जनवरी को इंदौर आएंगे संघ प्रमुख

नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के हिंदी मुखपत्र पांचजन्य ने भागवत के बयान का समर्थन किया है। आरएसएस के हिंदी मुखपत्र पांचजन्य ने संपादकीय में लिखा कि कुछ लोग अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए मंदिरों का प्रचार कर रहे हैं और खुद को हिंदू विचारक के रूप में पेश कर रहे हैं। जबकि अंग्रेजी मुखपत्र ऑर्गनाइजर ने इससे अलग राय व्यक्त की। ऑर्गनाइजर ने इसे ऐतिहासिक सच जानने और सभ्यतागत न्याय की लड़ाई कहा था। वहीं, संघ प्रमुख मोहन भागवत 3 जनवरी को इंदौर का दौरा करेंगे। इस दौरान वो मालवा और निमाड़ में तीन दिन तक रहेंगे। उनके कार्यक्रम की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं, वहीं सुरक्षा एजेंसियों को अलर्ट पर रखा गया है।
मंदिरों को राजनीति का हथियार बनाने पर चेतावनी
19 दिसंबर को पुणे में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने राम मंदिर निर्माण के बाद उभर रहे मंदिर-मस्जिद विवादों पर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा, "राम मंदिर बनने के बाद कुछ लोग नई जगहों पर इसी तरह के मुद्दे उठाकर खुद को हिंदू नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। हर दिन एक नया मामला उठाया जा रहा है। भारत को यह दिखाने की जरूरत है कि हम एक साथ रह सकते हैं।" भागवत ने मंदिरों को राजनीतिक हथियार न बनाने की अपील की और समाज से इन मुद्दों पर समझदारी दिखाने का आग्रह किया।पांचजन्य ने किया समर्थन
RSS के हिंदी मुखपत्र पांचजन्य ने अपने संपादकीय में भागवत के बयान का समर्थन करते हुए लिखा कि मंदिरों का राजनीतिक उपयोग स्वीकार्य नहीं है। संपादक हितेश शंकर ने लिखा, मंदिरों को राजनीति का हथियार बनाना चिंताजनक है। यह प्रवृत्ति हिंदू समाज की सांस्कृतिक धरोहरों को नुकसान पहुंचा सकती है।क्या हैं संपादकीय के प्रमुख बिंदु
- भागवत के बयान को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया : मीडिया और सोशल मीडिया पर भागवत के बयान को लेकर विवाद खड़ा किया गया। संपादकीय के अनुसार, उनका बयान समाज को समझदारी और विवेक का संदेश देता है।
- सोशल मीडिया पर भ्रामक प्रचार : संपादकीय ने सोशल मीडिया पर चल रहे भ्रामक प्रचार को खतरनाक बताया। कुछ असामाजिक तत्व इन विवादों को बढ़ावा देकर समाज की भावनाओं का शोषण कर रहे हैं।
- भारत की सांस्कृतिक विविधता का सम्मान : भारत एक ऐसी सभ्यता है, जो हजारों वर्षों से विविधता में एकता का सिद्धांत अपनाती आई है। संपादकीय में इन सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित करने की अपील की गई।
- मंदिरों के मुद्दों पर राजनीति की आलोचना : संपादकीय ने कहा कि मंदिरों से जुड़े विवादों का राजनीतिक लाभ उठाने की प्रवृत्ति बेहद चिंताजनक है।
- इतिहास के घावों को कुरेदने से बचने की अपील : भागवत का बयान हमें यह याद दिलाता है कि इतिहास के घावों को कुरेदने की बजाय हमें सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित करना चाहिए।












