
नई दिल्ली। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने गुरुवार को एक देश एक चुनाव वाली 18000 से ज्यादा पेज की रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपी। इसमें कहा गया है कि यह रिपोर्ट स्टेकहोल्डर्स-एक्सपर्ट्स से चर्चा के बाद 191 दिन की रिसर्च का नतीजा है। इसके लिए 2 सितंबर 2023 को पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली कमेटी का गठन किया गया था। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि वन नेशन-वन इलेक्शन 47 राजनीतिक दलों ने कमेटी को अपनी राय दी। इनमें से 32 ने पक्ष में और 15 ने विपक्ष में वोट दिया है। रिपोर्ट में कहा गया कि देश में एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बाद 100 दिनों के अंदर निकाय चुनाव भी करा लिए जाएं।
रिपोर्ट में दी गई ये सलाह
इस रिपोर्ट के पहले चरण में लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बारे में बताया गया है। दूसरे चरण में नगर पालिकाओं और पंचायतों को लोकसभा-विधानसभा के साथ इस तरह जोड़ने के लिए कहा गया कि निकायों के चुनावों को लोकसभा और विधानसभा चुनाव के 100 दिनों के अंदर करा लिया जाए।
• लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के आम चुनावों के साथ-साथ पंचायतों और नगर पालिकाओं में चुनाव कराने के लिए अनुच्छेद 324A की शुरुआत की जाए।
• सूची और पहचान पत्र में संशोधन का काम राज्य चुनाव आयोग की सलाह पर भारत का चुनाव आयोग करे।
• चुनाव आयोग लोकसभा, विधानसभा, स्थानीय निकाय चुनावों के लिए राज्य चुनाव अधिकारियों के परामर्श से सिंगल वोटर लिस्ट और वोटर आई कार्ड तैयार करेगा।
• सभी राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल अगले लोकसभा चुनाव यानी 2029 तक बढ़ाया जाए।
Ram Nath Kovind-led panel on 'One Nation One Poll' recommends single electoral roll, electoral Photo IDs
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— ANI Digital (@ani_digital) March 14, 2024
वन नेशन-वन इलेक्शन के समर्थन में पीएम मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने की वकालत कर चुके हैं। नवंबर-दिसंबर में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और इसके बाद अगले साल मई-जून में लोकसभा चुनाव होंगे। मई 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के आने के कुछ समय बाद से ही एक देश एक चुनाव को लेकर बहस शुरू हो गई थी।
क्या है एक देश-एक चुनाव का मतलब
एक देश-एक चुनाव या वन नेशन-वन इलेक्शन का मतलब है कि, पूरे देश में एक साथ ही लोकसभा और विधानसभा के चुनाव हों। बता दें कि, आजादी के बाद 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ ही होते थे। लेकिन कई विधानसभाएं 1968 और 1969 में समय से पहले ही भंग कर दी गईं। जिसके बाद 1970 में लोकसभा भी भंग कर दी गई और वन नेशन-वन इलेक्शन की परंपरा टूट गई।
वन नेशन-वन इलेक्शन के फायदे
- पैसों की बर्बादी से बचना : इस बिल को लेकर सबसे बड़ा तर्क यही दिया जा रहा है कि, इससे चुनाव में खर्च होने वाले करोड़ों रुपए बचाए जा सकते हैं। 1951-1952 लोकसभा चुनाव में 11 करोड़ रुपए, जबकि 2019 लोकसभा चुनाव में 60 हजार करोड़ रुपए खर्च हुए थए। पीएम मोदी कह चुके हैं कि, इस बिल से देश के संसाधन बचेंगे और विकास की गति धीमी नहीं पड़ेगी।
- बार-बार चुनाव कराने के झंझट से छुटकारा : भारत जैसे विशाल देश में हर साल कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं। इनके आयोजन में पूरी स्टेट मशीनरी और संसाधनों का इस्तेमाल किया जाता है। इस बिल के लागू होने से चुनावों की बार-बार की तैयारी से छुटकारा मिल जाएगा। चुनावों के लिए पूरे देश में एक ही वोटर लिस्ट होगी, इससे सरकार के विकास कार्यों में रुकावट नहीं आएगी।
- नहीं रुकेगी विकास कार्यों की गति : यह भी कहा जा रहा है कि, देश में बार-बार होने वाले चुनावों की वजह से आदर्श आचार संहिता लागू करनी पड़ती है। जिसकी वजह से सरकार समय पर कोई नीतिगत फैसला नहीं ले पाती या फिर विभिन्न योजनाओं को लागू करने में दिक्कतें आती हैं। इससे विकास कार्य प्रभावित होते हैं।
- काले धन पर लगेगी लगाम : एक तर्क यह भी है कि, इससे कालेधन और भ्रष्टाचार पर रोक लगने में मदद मिलेगी। विभिन्न राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों पर चुनावों के दौरान ब्लैक मनी के इस्तेमाल का आरोप लगता रहा है।
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