मप्र विद्युत नियामक आयोग का चेयरमैन बनने की दौड़ में अजीत केसरी, विनोद कुमार समेत कई पूर्व IAS

भोपाल। मध्यप्रदेश विद्युत नियामक आयोग के चेयरमैन पद के लिए पूर्व आईएएस अधिकारियों में दिलचस्पी बढ़ गई है। प्रशासन अकादमी के डीजी रहे विनोद कुमार और पूर्व अपर मुख्य सचिव अजीत केसरी के अलावा आशीष श्रीवास्तव, आरके सिंह सहित कई पूर्व आईएएस अधिकारियों ने इस पद के लिए आवेदन किया है। ऊर्जा विभाग के पास अब तक 50 से अधिक अधिकारियों के आवेदन पहुंच चुके हैं। आवेदन जमा करने की अंतिम तारीख 8 अक्टूबर तक थी।
लंबे समय से खाली है अध्यक्ष का पद
आयोग में लंबे समय से अध्यक्ष का पद खाली है। चेयरमैन एसपीएस परिहार का कार्यकाल 7 जनवरी 2025 को समाप्त हो गया था। इसके बाद से पद पर नियुक्ति नहीं हो सकी है। अब सरकार ने नई नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की है। आयोग में अध्यक्ष की नियुक्ति को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि बिजली कंपनियों और उपभोक्ताओं से जुड़े मामलों की सुनवाई तथा नियामकीय फैसलों के लिए आयोग की कार्यप्रणाली सुचारू रहना जरूरी है।
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सदस्य पद के लिए भी विज्ञापन
ऊर्जा विभाग ने आयोग के सदस्य पद के लिए भी विज्ञापन जारी किया है। आयोग के विधिक सदस्य गोपाल श्रीवास्तव का कार्यकाल जनवरी 2027 में समाप्त हो रहा है। चयन प्रक्रिया में तीन से चार महीने लगने की संभावना को देखते हुए विभाग ने पहले ही प्रक्रिया शुरू कर दी है। आयोग के दूसरे सदस्य गजेंद्र तिवारी का कार्यकाल 2028 तक है। नियमानुसार सुनवाई के लिए कम से कम दो सदस्यों की मौजूदगी जरूरी होने के कारण सदस्य पद पर समय रहते नियुक्ति देना भी अहम है। लंबे समय से रिक्त अध्यक्ष पद पर नियुक्ति से आयोग के कामकाज को गति मिलने की उम्मीद है।
एप्को में पांच संविदा कर्मचारियों को नौकरी से हटाया
भोपाल। पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय संगठन (एप्को) में सरकार से मिलने वाला सालाना करीब आठ करोड़ रुपए का अनुदान बंद होने के बाद आर्थिक संकट गहरा गया है। इसका सीधा असर संविदा कर्मचारियों पर पड़ा है। संगठन में तीन रिसर्च फैलो समेत पांच संविदा कर्मचारियों को नौकरी से बाहर कर दिया गया है। नौकरी जाने के बाद एक महिला कर्मचारी की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
अनुदान मिलना बंद हुआ
बताया जाता है कि एप्को को हर साल सरकार से करीब आठ करोड़ रुपए का अनुदान मिलता था, लेकिन चालू वित्तीय वर्ष में यह राशि बंद कर दी गई। इसके बाद संगठन के सामने कर्मचारियों के वेतन और अन्य खर्चों को लेकर आर्थिक दबाव बढ़ गया है। सूत्रों के अनुसार जिन कर्मचारियों के प्रोजेक्ट चल रहे हैं, उनकी सेवाएं फिलहाल सुरक्षित हैं, जबकि बिना प्रोजेक्ट वाले संविदा कर्मचारियों पर नौकरी जाने का खतरा मंडरा रहा है। जिन कर्मचारियों को हटाया गया है, उनमें कुछ ऐसे भी हैं जो पिछले 10 से 15 वर्षों से एप्को में सेवाएं दे रहे थे।
एप्को अपने आय के स्रोतों पर काम करता है
इस बारे में एसीएस अनिरुद्ध मुखर्जी ने कहा कि एप्को को सरकार से कोई ग्रांट नहीं मिलता है, उसको अपने आय के स्रोतों पर काम करना होता है। इसके चलते कर्मचारियों को रखना और नहीं रखना प्रोजेक्टों की जरूरतों पर निर्भर करता है। जिन संविदा कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त की गई हैं, उनकी जरूरत नहीं थी।
अधिकारी अपने अनुसार काम करना चाह रहे थे
बाहर किए गए संविदा कर्मचारी अश्विनी सिंह ने कहा कि डीम्ड परमिशन के संबंध में अधिकारी अपने अनुसार काम कराना चाह रहे थे। मैंने उनके अनुसार काम नहीं किया, इसीलिए मुझे बाहर किया गया।




















