PU Special :सरकारी स्कूल बनेंगे ‘आनंद घर’, ‘बाल देवो भवः’ की भावना से पढ़ाएंगे शिक्षक

मध्य प्रदेश में आत्मनिर्भर शिक्षक संदर्भ समूह के करीब 2500 शिक्षक ‘मेरा विद्यालय मेरी पहचान’ अभियान से जुड़े हैं। बच्चों की रुचि, जिज्ञासा और खुशी को केंद्र में रखकर सरकारी स्कूलों को ‘आनंद घर’ बनाने की पहल की जा रही है।
सरकारी स्कूल बनेंगे ‘आनंद घर’, ‘बाल देवो भवः’ की भावना से पढ़ाएंगे शिक्षक
सरकारी स्कूल बनेंगे ‘आनंद घर’

रामचन्द्र पाण्डेय, भोपाल। मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के तरीके में बदलाव लाने के लिए शिक्षकों का एक स्वैच्छिक समूह पहल कर रहा है। आत्मनिर्भर शिक्षक संदर्भ समूह ‘बाल देवो भवः’ की भावना के साथ विद्यालयों को ‘आनंद घर’ बनाने की दिशा में काम कर रहा है। समूह से करीब 2500 शिक्षक जुड़े हैं। इस पहल का उद्देश्य बच्चों को केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने तक सीमित न रखकर उनकी रुचि, जिज्ञासा, कल्पनाशीलता और भावनाओं को समझते हुए सीखने के अवसर देना है। समूह का मानना है कि बच्चा केवल विद्यार्थी नहीं बल्कि अपनी रुचि, विचार और निर्णय लेने की क्षमता रखने वाला व्यक्तित्व है। इसलिए स्कूलों में पढ़ाई का माहौल डर, दबाव और दंड के बजाय प्रेम, संवाद और सहभागिता पर आधारित होना चाहिए। इसी सोच को आगे बढ़ाने के लिए ‘मेरा विद्यालय मेरी पहचान’ अभियान चलाया जा रहा है। इसके माध्यम से शिक्षकों को ऐसा वातावरण तैयार करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है, जहां बच्चे सहज होकर सवाल पूछ सकें, अपनी बात रख सकें और अपनी रुचि के अनुसार सीख सकें।

15 नवंबर को मनाया जाएगा ‘बाल आनंद दिवस’

आत्मनिर्भर शिक्षक संदर्भ समूह का स्थापना दिवस 15 नवंबर को शिक्षाविद् गिजूभाई की जयंती के अवसर पर मनाया जाएगा। इस अवसर पर भोपाल स्थित दुष्यंत कुमार पांडुलिपि संग्रहालय में कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा, जिसे ‘बाल आनंद दिवस’ के रूप में मनाने की तैयारी है। कार्यक्रम में उन शिक्षकों को ‘गिजूभाई शिक्षक सम्मान’ प्रदान किया जाएगा, जो अपने विद्यालयों को आनंद घर बनाने की दिशा में उल्लेखनीय प्रयास कर रहे हैं। समूह से जुड़े कई शिक्षक ऐसे भी हैं, जिन्हें राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय शिक्षक सम्मान मिल चुके हैं। इस सम्मान का उद्देश्य बाल-केंद्रित शिक्षा के लिए काम कर रहे शिक्षकों के प्रयासों को पहचान देना और दूसरे शिक्षकों को भी ऐसी पहल के लिए प्रेरित करना है।

खेल, कहानियों और पुस्तकालय से रोचक बनेगी पढ़ाई

सरकारी स्कूलों में पढ़ाई को बच्चों के लिए अधिक रोचक और सहज बनाने के लिए खेल, कहानियों, पुस्तकालय, रीडिंग कॉर्नर और विभिन्न गतिविधियों के इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही बच्चों को ब्लैकबोर्ड और ग्रीनबोर्ड पर स्वयं लिखने तथा अपनी रचनात्मकता दिखाने के अवसर देने की बात कही जा रही है। यह पहल शिक्षाविद् गिजूभाई के बाल-केंद्रित शिक्षा दर्शन से प्रेरित है। इस विचार के अनुसार, शिक्षा की प्रक्रिया में बच्चे की रुचि, अनुभव और सहज भागीदारी को महत्व दिया जाना चाहिए। समूह का कहना है कि सरकार की ओर से स्कूलों में पढ़ाई के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं। अब जरूरत शिक्षकों को इन संसाधनों का बेहतर और रचनात्मक उपयोग करने के लिए प्रेरित करने की है। इस पहल में शिक्षक की भूमिका केवल पाठ पढ़ाने तक सीमित नहीं है। शिक्षक से अपेक्षा है कि वह बच्चों की जिज्ञासा को प्रोत्साहित करे, उनकी बात सुने और उन्हें अपनी क्षमता के अनुसार सीखने तथा आगे बढ़ने का अवसर दे।

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पूर्व छात्रों और शिक्षकों को जोड़ने के लिए मनाया जाएगा विद्यालय दिवस

आत्मनिर्भर शिक्षक संदर्भ समूह विद्यालयों को आनंद घर बनाने के साथ-साथ पूर्व छात्रों को भी अपने स्कूलों से दोबारा जोड़ने की पहल कर रहा है। इसके तहत बसंत पंचमी पर विद्यालय दिवस मनाने का प्रस्ताव है। इस अवसर पर पूर्व छात्रों और शिक्षकों को एक-दूसरे का सम्मान करने का मौका मिलेगा। समूह की मंशा है कि विद्यालय दिवस के माध्यम से पूर्व छात्र अपने पुराने स्कूल से जुड़ाव महसूस करें और उसके विकास में सहयोग करने के लिए प्रेरित हों। इससे विद्यालय और उसके पूर्व विद्यार्थियों के बीच संबंध मजबूत करने के साथ स्कूल के विकास में सामुदायिक भागीदारी को भी बढ़ावा मिल सकता है।

बच्चे सहज महसूस करें, तभी विद्यालय बनेगा आनंद घर

आत्मनिर्भर शिक्षक संदर्भ समूह के संस्थापक डॉ. दामोदर जैन का कहना है कि विद्यालय तभी आनंद घर बन सकता है, जब बच्चे वहां सहज महसूस करें। उनकी जिज्ञासा, रुचि और स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए सीखने के अवसर उपलब्ध कराना ही शिक्षक की वास्तविक भूमिका है। बच्चों के लिए ऐसा माहौल तैयार करना जरूरी है, जहां वे बिना डर के अपनी बात कह सकें और सीखने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग ले सकें।

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‘शिक्षक नौकरी के बजाय बाल देवो भवः की सोच अपनाएं’

स्कूल शिक्षा विभाग के मंत्री उदयप्रताप सिंह ने आत्मनिर्भर शिक्षक संदर्भ समूह की इस पहल को प्रशंसनीय बताया है। उनका कहना है कि शिक्षक को राष्ट्र निर्माता का ओहदा मिला हुआ है। यदि सभी शिक्षक नौकरी करने की मानसिकता के बजाय ‘बाल देवो भवः’ की सोच अपना लें, तो शिक्षा की तस्वीर बदल सकती है। मंत्री के अनुसार स्कूलों में जरूरी संसाधन मौजूद हैं और जरूरत शिक्षकों की सोच में बदलाव लाने की है। बच्चों को केंद्र में रखकर शिक्षा देने की भावना विकसित होने से विद्यालयों का वातावरण बेहतर बनाया जा सकता है।

Dr. Sumit  Shrivastava
By Dr. Sumit Shrivastava

सुमित श्रीवास्तव एक अनुभवी मीडिया प्रोफेशनल, बिजनेस पत्रकार और शोधकर्ता हैं। मास कम्युनिकेशन में M.P...

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