PU Special :बिगड़ रही स्टूडेंट-टीचर इक्वेशन-AI पर बढ़ रहा भरोसा, शिक्षकों से बना रहे दूरी, स्कूल जाने से कतरा रहे बच्चे

पल्लवी वाघेला, भोपाल। पहले किसी भी सवाल का जवाब जानने के लिए बच्चे शिक्षक के पास जाते थे, लेकिन अब स्क्रीन पर मौजूद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) उनका पहला सहारा बन रहा है। समस्या यह है कि बच्चों का भरोसा तकनीक पर इतना बढ़ने लगा है कि वे शिक्षक से सवाल पूछने, अपनी बात शेयर करने और क्लास में कम्यूनिकेट करने से भी कतराने लगे हैं। आलम यह है कि एआई पर बढ़ता विश्वास बच्चों और टीचर के रिलेशन बिगाड़ रहा है। कुछ बच्चे स्कूल जाने से बच रहे हैं, तो कुछ के बदले व्यवहार से परेशान टीचर और पेरेंट्स उनकी काउंसलिंग और हीलिंग के लिए विशेषज्ञों तक पहुंच रहे हैं। अकेले भोपाल में तीन महीने के दौरान ऐसे चार और प्रदेशभर में 26 मामले जानकारी में आए हैं। मनोवैज्ञानिकों की चिंता है कि तकनीक पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता बच्चों की जिज्ञासा, रचनात्मकता और संचार कौशल को प्रभावित कर सकती है।
बच्चे ने कहा स्कूल टीचर्स की जरूरत नहीं
भोपाल के 11 साल के बच्चे ने स्कूल जाने से मना कर दिया। पेरेंट्स उसे लेकर साउंड हीलिंग एक्सपर्ट आरती सिन्हा के पास पहुंचे। बच्चे का तर्क था कि उसे स्कूल और टीचर्स की जरूरत नहीं है। पूछने पर बच्चे ने कहा कि एआई सब बता सकता है तो टीचर की क्या जरूरत। बच्चे को थेरेपी देने के साथ ही काउंसलिंग कर समझाया गया कि स्कूल केवल स्टडी नहीं बल्कि कई अन्य स्किल को डेवलप करने की जगह है।
एआई के इस्तेमाल से लिखने में आगे, बोलने में पीछे
काउंसलर दिव्या दुबे मिश्रा से देवास के एक अभिभावक ने संपर्क कर बताया कि क्लास दसवीं लिखते वक्त बहुत अच्छा लिख लेती है, लेकिन जब क्लास में या कहीं मौखिक रूप से उत्तर देना होता है तो वे शब्दों में अटक जाती है। काउंसलर के मुताबिक एआई का इस्तेमाल करने पर सिस्टेमैटिक राइटिंग तो मिल जाती है, लेकिन इससे खुद की वॉक्यूबलरी नहीं बढ़ पाती और जब खुद विचार व्यक्त करने हो तो बच्चे नहीं कर पाते।
बच्चे का तर्क-स्क्रीन पर सवाल पूछना आसान
ग्वालियर का आठ साल का एक बच्चा अपनी परेशानियां शिक्षक के सामने रखने के बजाय तकनीक से बातचीत करना पसंद करने लगा। स्क्रीन पर सवाल पूछना उसे आसान लगता था, जबकि आमने-सामने बात करने में वह असहज महसूस करता था। शिक्षक के समझाने पर भी उसका भरोसा एआई के जवाबों पर ज्यादा रहा। धीरे-धीरे बच्चे में रचनात्मकता और संवाद हीनता नजर आने लगी। काउंसलिंग के जरिए उसमें इंटरेक्शन की भावना को बढ़ाया गया।
तकनीक का गलत इस्तेमाल अलार्मिंग सिचुएशन
इस बारे में साइकोलॉजिस्ट डॉ. दीप्ति सिंघल ने कहा कि जब बच्चा हर सवाल का जवाब तकनीक से लेने लगे और वास्तविक लोगों से बातचीत कम कर दे, तब सतर्क होने की जरूरत है। उनके दिमाग में हमेशा सवालों का अंबार लगा रहता है। लेकिन जब उन्हें अपने सवालों के बने-बनाए जवाब मिल जाते हैं, तो इससे उनकी आलोचनात्मक और विश्लेषणात्मक क्षमता खत्म होने लगती है। लंबे समय में इसका असर उनकी याददाश्त पर भी पड़ता है क्योंकि वह खुद जवाब ढूंढने के बजाए एआई पर निर्भर हो जाते हैं। शिक्षक केवल जानकारी देने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह बच्चे को सवाल करना, तर्क करना, गलतियों से सीखना और दूसरों के विचार समझना भी सिखाता है। बच्चों को एआई का संतुलित उपयोग सिखाना जरूरी है। शिक्षकों को भी कक्षा में सवाल पूछने और खुलकर अपनी बात रखने का माहौल बनाना चाहिए।
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