
अनुज मैना-भोपाल। अशोकनगर जिले का चंदेरी ऐतिहासिक स्थलों के साथ ही साड़ियों के लिए प्रसिद्ध है। यहां की साड़ियों की डिमांड भारत ही नहीं, विदेशों में भी है। चंदेरी से करीब 5 किमी दूरी पर प्राणपुर गांव को भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय द्वारा देश का पहला क्रॉफ्ट हैंडलूम विलेज घोषित किया गया है। साथ ही चंदेरी साड़ी को जीआई टैग दिया गया है। पीपुल्स समाचार ने चंदेरी, प्राणपुर के बुनकरों से बात की तो उन्होंने बताया, जीआई टैग होने के बाद भी यूपी और राजस्थान में भी चंदेरी साड़ी बनाई जा रही हैं।
यहां पर साड़ी की बुनाई
चंदेरी के नाम से उप्र के ललितपुर, लागौर, सिरोन, बढ़वार सहित 15 से 20 गांवों में, राजस्थान के कोटा में और मप्र के ही अशोकनगर जिले के ईसागढ़, मुंगावली और शिवपुरी जिले में भी यह साड़ी बनाई जा रही है।
एक्सपर्ट से जानिए नियम
एडवोकेट अंकुर पस्तोर के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो किसी जीआई टैग को गलत तरीके से लागू करता है या संबंधित क्षेत्र के बाहर वस्तु का निर्माण करता है, उसे 3 साल तक की सजा, 2 लाख तक जुर्माना लगाया जा सकता है।
कम हुई बचत
हम कई पीढ़ियों से साड़ी बनाने का काम करते आ रहे हैं। प्राणपुर के क्रॉफ्ट विलेज बनने से पहले सिर्फ कोली और मुस्लिम समाज के लोग ही साड़ी बनाते थे। अब सोनी, प्रजापति, कुशवाहा, रैकवार, अहिरवार समाज के लोग बुनाई का काम करने लगे हैं। इससे कम दाम पर साड़ी बेचनी पड़ रही है।
4 हजार से लेकर 50 हजार तक की साड़ियां
ऐसे पहचानें : चंदेरी साड़ी में रेशम का ताना बुना जाता है तो वहीं बाने में सूती धागों का इस्तेमाल किया जाता है। जब आप चंदेरी छूएंगे तो ये काफी लाइट वेट महसूस होती हैं।
- सिल्क 4 हजार से 50 हजार रु.
- कॉटन सिल्क 1 हजार से 20 हजार रु.
- सिल्क मसराई 1500 से 20 हजार रु.
- पूना सिल्क 4 हजार से 25 हजार रु.
उप्र में भी चंदेरी के नाम से बेची जा रही साड़ी
जीआई टैग होने के बाद भी मप्र के अन्य शहरों के साथ ही उप्र, राजस्थान में बनने वाली साड़ी को भी चंदेरी साड़ी के नाम से बेचा जा रहा है। – आनंदीलाल कोली, बुनकर
चंदेरी के बाहर यदि कोई साड़ी बनाकर उसे चंदेरी के नाम से बेच रहा है तो उस पर कार्रवाई करने का प्रावधान है। इसे वरिष्ठ अधिकारियों के संज्ञान में लाकर कार्रवाई की जाएगी। – सतीश तिवारी, असिस्टेंट डायरेक्टर, जिला हस्तकरघा कार्यालय, चंदेरी