
अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि और नाटककार विलियम शेक्सपीयर की एक मशहूर लाइन है- नाम में क्या रखा है? लेकिन बात अगर ज्योतिष की हो, तो नाम में बहुत कुछ रखा है। कैसे? अकसर कमजोर ग्रह पर नाम रखने से जीवन में समस्याएं आती रहती हैं। नाम के अक्षर बदलने से भी बहुत प्रभाव पड़ता है। आइए जानते हैं, राशियां कैसे तय होती हैं और नामकरण किस आधार पर होता है?
जातक की राशि कैसे पता करें?
जब ज्योतिष की बात आती है, तो सबसे पहले यही देखते हैं कि जातक की राशि क्या है? एक लाइन में इसका जवाब है कि जिस राशि में चंद्रमा होता है, वहीं जन्म राशि या चंद्र राशि है।
अकसर प्रचलित नाम राशि के नाम से नहीं रखा जाता, क्योंकि कुछ लोग इसे तंत्र-मंत्र, जादू-टोने के गलत इस्तेमाल के लिए उपयोग करते हैं। इसे देखते हुए लोग राशि का नाम गुप्त रखकर दूसरा नाम रखने लगे। अब उतने योग्य तंत्र साधक नहीं हैं, इसलिए नाम जन्म राशि के अक्षर पर ही रखना चाहिए, अन्यथा जातक को दो राशियों का फल भुगतना पड़ता है।
नाम जो भी रखें, उसका अर्थ जरूर हो
वैसे नाम भी भगवान के नाम पर रखा जाता रहा है, ताकि उस नाम का शुभत्व जीवन में मिले और ईश्वर का नाम भी लेते रहें। दूसरा मत यह है कि राशि के नाम को पुकारे जानेवाले नाम के रूप में रखना दूसरों को जातक की कमजोरी बता देता है, जिसे उसके खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है। नाम जो भी रखें, उसका अर्थ जरूर होना चाहिए, क्योंकि इसका जातक के उत्थान और पतन पर प्रभाव पड़ता है। नाम का अर्थ न हो, तो जीवन भी निरर्थक हो जाता है।
नाम रखने के भी कुछ नियम हैं
नाम रखने के भी कुछ नियम हैं। पुकारने वाले नाम को कुंडली के सबसे मजबूत ग्रहों के अनुसार रखें, तो विशेष लाभ होता है। कमजोर ग्रह पर नाम रखने से जीवन में समस्याएं आती रहती हैं। नाम के अक्षर बदलने से भी बहुत प्रभाव पड़ता है। इसीलिए आपने सुना होगा कि नाम बदलने से किस्मत बदल गई. लेकिन किसी भी नाम के अक्षरों को 12 वर्ष की आयु के पहले बदल लें, तो अधिक फायदा होता है। 30 साल की आयु के बाद नाम के अक्षर बदलें तो खास लाभ नहीं होता। अगर परिपक्व होने के बाद बदलाव करना है, तो पूरा नाम ही बदल लें, लेकिन हर दस्तावेज में नाम होने के कारण बाद में बदलाव कठिन काम होता है।
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