PU Special :पिता को विदेश में मिला नौकरी का अवसर, बच्चे अपने देश में ही रहना चाहते थे, इसलिए घर छोड़ निकले भाई-बहन

उत्तर प्रदेश के 10 और 13 साल के भाई-बहन विदेश जाने की बात से परेशान होकर घर से निकल गए और इंदौर में नानी के पास जाने की कोशिश की। भोपाल में रेस्क्यू के बाद दोनों को परिवार को सौंप दिया गया। काउंसलिंग में बच्चों ने कहा कि उन्हें दोस्तों, नानी और चाचू से दूर होने का डर था।
पिता को विदेश में मिला नौकरी का अवसर, बच्चे अपने देश में ही रहना चाहते थे, इसलिए घर छोड़ निकले भाई-बहन

पल्लवी वाघेला, भोपाल। माता-पिता ने बच्चों को समझाया कि विदेश जाकर रहेंगे तो बेहतर पढ़ाई और सुविधाएं मिलेंगी, लेकिन 10 और 13 साल के भाई-बहन को विदेश की चमक से ज्यादा अपना देश और अपने लोग प्यारे थे। दोनों ने साफ कह दिया- “हमें विदेश नहीं जाना, हमें इंडिया में ही रहना है।” परिवार के विदेश में बसने की तैयारी शुरू हुई तो दोनों घर से निकल पड़े। उनका इरादा इंदौर में रहने वाली नानी के पास पहुंचने का था। उत्तर प्रदेश से निकले दोनों बच्चों को भोपाल में रेस्क्यू कर परिवार को सौंप दिया गया।

बच्चों को सता रहा था अपनों से दूर होने का डर

काउंसलिंग के दौरान बच्चों ने बताया कि पिता को विदेश में काम करने की अपॉर्च्युनिटी मिली थी और परिवार वहां शिफ्ट होने की तैयारी कर रहा था। माता-पिता उन्हें समझा रहे थे कि दूसरे देश में पढ़ाई और करियर के बेहतर अवसर मिलेंगे। लेकिन बच्चों को अपने दोस्तों, नानी और चाचू से दूर होने का डर सताने लगा। बच्चों ने काउंसलर से कहा- “हमारा देश सबसे अच्छा है। यहां हमारे दोस्त हैं, नानी हैं और चाचू भी हैं। वहां हमारे पास कोई नहीं होगा। हम किसी को नहीं जानते। हम यहां से कहीं नहीं जाना चाहते।” विदेश जाने की बात पक्की होती देख दोनों ने घर छोड़ने का फैसला किया। दोनों उत्तर प्रदेश से इंदौर जाने के लिए निकले थे। रास्ते में उनकी स्थिति का पता चलने के बाद उन्हें भोपाल में रेस्क्यू किया गया। इसके बाद परिवार से संपर्क कर बच्चों को सुरक्षित उनके सुपुर्द किया गया।

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अचानक दूसरे देश जाने से महसूस कर रहे थे असुरक्षित

काउंसलिंग में सामने आया कि बच्चों की परेशानी विदेश जाने के विरोध से ज्यादा अपने परिचित माहौल को खोने की आशंका थी। 10 और 13 साल की उम्र में दोस्त, स्कूल, रिश्तेदार और रोजमर्रा का परिचित माहौल बच्चों की भावनात्मक सुरक्षा का हिस्सा होता है। अचानक दूसरे देश में जाने की बात उन्हें असुरक्षित महसूस करा रही थी। बच्चों को समझाया गया कि तकनीक ने दूरियों को काफी कम कर दिया है। वे अपने दोस्तों और परिजन से रोज बात कर सकते हैं और वीडियो कॉल के जरिए उन्हें देख सकते हैं। अपनी रोजमर्रा की गतिविधियां भी वीडियो कॉल पर परिवार और दोस्तों के साथ साझा कर सकते हैं। वहीं, परिवार को समझाया गया कि बच्चों पर अपनी बात थोपने या डांटकर समझाने के बजाय उन्हें विश्वास में लेकर बात करें। उन्हें यह भी बताया जाए कि पिता को मिली जॉब का कॉन्ट्रैक्ट तीन साल का है। इसके बाद परिस्थितियों के अनुसार परिवार भविष्य में दोबारा भारत आकर रह सकता है।

एक्सपर्ट व्यू : समझें उनकी भी बात

साइकोलॉजिस्बट काउंसलर दिव्या  दुबे मिश्रा ने कहा कि बच्चों के लिए नए देश में जाना सिर्फ घर बदलना नहीं होता। उनके लिए यह दोस्तों, स्कूल, रिश्तेदारों और पूरे परिचित संसार से दूर होने जैसा हो सकता है। माता-पिता को बच्चों के सामने केवल बेहतर भविष्य और सुविधाओं की बात करने के बजाय उनकी आशंकाएं भी सुननी चाहिए। उन्हें समझाना जरूरी है कि नया देश कैसा होगा, वहां कौन साथ रहेगा और वे अपने पुराने रिश्तों से किस तरह जुड़े रह सकेंगे।

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By Devendra shakya

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