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भोपाल में बोले ज्यां द्रेज-जेंडर असमानता और जातीय व्यवस्था का सीधा असर बच्चों के भोजन के अधिकार पर पड़ता है

भोपाल में बच्चों के भोजन, पोषण और अधिकारों पर तीसरे राष्ट्रीय अधिवेशन में असमानता, लैंगिक भेदभाव और जातीय व्यवस्था को बड़ी बाधा बताया गया। देशभर से 400 से अधिक प्रतिनिधियों ने कुपोषण, शिक्षा, खाद्य सुरक्षा, विस्थापन और बाल अधिकारों पर चर्चा की।
भोपाल में बोले ज्यां द्रेज-जेंडर असमानता और जातीय व्यवस्था का सीधा असर बच्चों के भोजन के अधिकार पर पड़ता है
भोपाल। बच्चों के भोजन अधिकार पर राष्ट्रीय अधिवेशन को ज्यां द्रेज ने संबोधित किया।

भोपाल। भारत में बच्चों को पोषण और उनके अधिकार अब भी पूरी तरह नहीं मिल पा रहे हैं। असमानता, लैंगिक भेदभाव और जातीय व्यवस्था इसके रास्ते में बड़ी बाधा हैं। इन मुद्दों के खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष की जरूरत है। यह बात बच्चों के भोजन के अधिकार के तीसरे राष्ट्रीय अधिवेशन में सामने आई। आइकफ आश्रम में शुक्रवार से शुरू हुए तीन दिवसीय अधिवेशन में देशभर से 400 से अधिक कार्यकर्ता और प्रतिनिधि शामिल हुए हैं। अधिवेशन में बच्चों के भोजन, पोषण और अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हो रही है।

महिलाएं कुपोषित तो बच्चे को उचित पोषण कैसे

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज ने कहा कि असमानता, लैंगिक असमानता और जातीय व्यवस्था का सीधा असर बच्चों के भोजन के अधिकार पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि पिछले 25 वर्षों में भारत का उत्पादन तेजी से बढ़ा है, लेकिन मजदूरी में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि जो महिलाएं खुद कुपोषित हैं, उनके बच्चों का उचित पोषण कैसे हो सकता है। जातीय व्यवस्था के कारण बच्चों की शिक्षा भी प्रभावित होती है। उन्होंने इसे शोषण की एक गंभीर व्यवस्था बताया।

सबसे बड़ी जरूरत बच्चों और उनके भविष्य के बारे में सोचने की

भारत ज्ञान विज्ञान समिति की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आशा मिश्रा ने कहा कि देश में आज भी एक ऐसा तबका है, जिसके पास घर और पहचान नहीं है। वह शिक्षा और अच्छे स्वास्थ्य से भी दूर है। उन्होंने कहा कि आज सबसे बड़ी जरूरत बच्चों और उनके भविष्य के बारे में सोचने की है।

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सभी अधिकारों के लिए मिलकर संघर्ष करना होगा

सीटू की महासचिव कॉमरेड सिंधु ने कहा कि पोषण ट्रैकर का उद्देश्य हर बच्चे के पोषण की निगरानी करना था, ताकि कोई बच्चा वंचित न रहे। लेकिन जमीनी अनुभव बताते हैं कि इसके बाद भी पोषण से वंचित बच्चों की संख्या बढ़ी है। उन्होंने कहा कि एक अधिकार दूसरे अधिकार से जुड़ा है। इसलिए सभी अधिकारों के लिए मिलकर संघर्ष करना होगा।

सामुदायिक अधिकार से क्षेत्र में कई बदलाव

मेलघाट की सरपंच और कोरकू समुदाय से आने वाली ललिता मानेकर ने अपने क्षेत्र के अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि उनके क्षेत्र में आज भी नियमित बिजली नहीं है और सरकारी योजनाएं ठीक से नहीं पहुंचती हैं। इसके बावजूद लोग लगातार अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि सामुदायिक अधिकार मिलने के बाद उनके क्षेत्र में कई बदलाव आए हैं।

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बाल अधिकारों पर होंगे सत्र

अधिवेशन के पहले दिन कुपोषण, निजीकरण, भेदभाव और बहिष्कार, डिजिटलीकरण तथा विस्थापन जैसे मुद्दों पर समानांतर सत्र आयोजित किए गए। अधिवेशन के दूसरे दिन बच्चों के अधिकारों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा आगे बढ़ेगी। प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना से संबंधित अध्ययन की प्रस्तुति, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, पीएम पोषण, क्रेच योजना, कृषि, पोषण, विकसित भारत के शोर के बीच भूख और पोषण, बाल अधिकारों से संबंधित विषयों पर जनप्रतिनिधियों की प्रतिक्रियाओं के सत्र आयोजित किए जाएंगे। 

Naresh Bhagoria
By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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