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ऐसा संग्रहालय जिसमें प्रादर्श कांच के बॉक्स में नहीं होते, बल्कि दर्शक इन्हें छूकर महसूस करते है

जनजातीय संग्रहालय का उद्घाटन भले ही साल 2013 में हुआ हो लेकिन इससे पहले इसकी इमारत लगभग सात साल खाली रही थी क्योंकि किसी को सूझ नहीं रहा था कि अंदर से संग्रहालय कैसा हो। वास्तुकार रेवती कामत संग्रहालय का बाहरी डिजाइन तैयार कर चुकी थीं। तब यह संग्रहालय ट्राइबल विभाग के पास था लेकिन फिर संस्कृति विभाग के तत्कालीन डायरेक्टर श्रीराम तिवारी से संपर्क किया गया कि क्या वे इस संग्रहालय को मप्र की जनजातियों के संदर्भ में तैयार कर सकते हैं।

अब चुनौती यह थी कि किसी के पास भी संग्रहालय विज्ञान का अनुभव नहीं था लेकिन जनजातीय संस्कृति से रूबरू थे, संस्कृति विभाग की पत्रिका चौमासा से संपादक अशोक मिश्रा। फिर अशोक मिश्रा ने साथ लिया भारत भवन के कलाकार हरचंदन सिंह भट्टी का और तत्कालीन संस्कृति विभाग के निदेशक श्रीराम तिवारी ने साल 2009 में दोनों को संग्रहालय तैयार करने का जिम्मा सौंपा। साल 2010 में लगभग 1500 आदिवासी कलाकारों के साथ काम शुरू हुआ। इस साल मप्र जनजातीय संग्रहालय अपनी स्थापना के 10 वर्ष पूरे चुका है। इसके बनने के पीछे की रोचक कहानी से पाठकों को रूबरू करा रहे हैं।

रात 3.30 बजे संग्रहालय में पानी भरा तो कलाकारों और अधिकारियों ने बचाए प्रादर्श

ईश्वर और सरकार ने मौका दिया कि हम दुनिया में हटकर एक संग्रहालय बना सके। उस समय मुख्य सचिव अवनि वैश्य से चर्चा में निष्कर्ष निकला कि हम ढर्रे वाला संग्रहालय नहीं, बल्कि मिसाल बने ऐसा संग्रहालय बनाएंगे।। हमने सोचा कि अक्सर देखने में आता है कि संग्रहालय से समाज जुड़ नहीं पाता, तो हमने आदिवासियों से उनके घर को बनाने का कहा, मुझे लगता है कि हमने तो सिर्फ मदद की इसलिए यह हटकर बन सका। इसे संग्रहालय जरूर कहते हैं, लेकिन यह आदिवासी जन का घर है। इसे बनाने में कई लोगों का योगदान है। मुझे याद है कि इसके उद्घाटन से पहले आदिवासी बोली व लोककला अकादमी का ऑफिस म्यूजियम में शिफ्ट हो रहा था और सामान अनलोड भी नहीं हुआ था कि एक दिन भयानक बारिश हुई जिससे रीजनल कॉलेज से लगी बॉउंड्रीवॉल टूट गई और पानी संग्रहालय में भरना शुरू हो गया और रात 3.30 बजे आदिवासी कलाकार और अशोक मिश्रा उन प्रादर्शों को बचाने का जतन कर रहे थे और मुझे इसकी सूचना सुबह 8.30 बजे मिली। यह जज्बा ही था कि सभी ने जी-जान से बिना हंगामा किए रात ही रात में प्रादर्शों को बचा लिया था।

कोई संग्रहालय नहीं घूमा ताकि नवाचार कर सकें

मैं शुरुआत में थोड़ा घबरा गया था कि इतने बड़े संग्रहालय को कैसे तैयार करेंगे। लेकिन हमारे द्वारा कराया गया फील्ड सर्वे काम आया और सरकार ने हमारे ऊपर भरोसा जताया। मुझे याद है कि उस समय भील कलाकार भूरी बाई ने स्वराज भवन में एक बैठक में कहा था, हम अपना संग्रहालय खुद बना सकते हैं। वही हम सब का विचार था। सरकार ने हमसे कहा था देश-दुनिया के संग्रहालय विजिट करना चाहें तो करें लेकिन हमने प्रदेश के जनजातीय कलाकारों के साथ मिलकर संग्रहालय को तैयार करवाया जो अब देश-दुनिया में मिसाल बन गया है। -हरचंदन सिंह भट्टी, वरिष्ठ कलाकार,भारत भवन

जनजातीय कलाकारों की सोच से बना संग्रहालय

मैंने और हरचंदन सिंह भट्टी ने सोचा कि हम कोई भी संग्रहालय विजिट नहीं करेंगे, क्योंकि अगर कुछ देखेंगे तो उससे भिन्न करने की कोशिश करेंगे या फिर उससे बेहतर। हम संग्रहालय को देखने के तरीके पर पुनर्विचार कर रहे थे कि संग्रहालयों का प्रदर्शन बदलना चाहिए। दर्शकों से प्रादर्श की दूरी खत्म होना चाहिए। प्रादर्श तभी संवाद करते हैं, जब यह छुए जा सकें। कांच के बॉक्स के भीतर रखे प्रादर्श से दर्शकों का लगाव नहीं होता। आज भी कई राज्यों से संदेश आता है कि हमारे राज्य में भी ऐसा संग्रहालय बनवाने में मदद करें। -अशोक मिश्रा, क्यूरेटर, जनजातीय संग्रहालय

म्यूजियम के बारे में…

10 साल में 16 लाख दर्शकों ने विजिट किया ट्राइबल म्यूजियम

6 जून 2013 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने राज्यपाल रामनरेश यादव और सीएम शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी में संग्रहालय का उद्धाटन किया था।

6 गैलेरी के माध्यम से दिखती है प्रदेश व छग की जनजातीय संस्कृति

35 करोड़ 20 रु. लाख की लागत में बनकर तैयार हुआ था संग्रहालय।

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