दुनिया की पहली न्यूक्लियर क्लॉक तैयार: ऑस्ट्रिया के वैज्ञानिकों ने बनाया एटॉमिक क्लॉक से भी सटीक टाइमकीपर , 3 करोड़ साल में होगी 1 सेकंड का गड़बड़ी

वियाना। पीढ़ियों से दुनिया की सबसे सटीक माप के लिए एटॉमिक क्लॉक (परमाणु घड़ियों) का इस्तेमाल होता रहा है। अब ऑस्ट्रिया के रिसर्चर्स ने दुनिया की पहली खुद को स्थिर रखने वाली न्यूक्लियर क्लॉक बनाई है। इससे माप से एक ऐसे दौर की शुरुआत हो सकती है जो भविष्य में पारंपरिक एटॉमिक स्टैंडर्ड्स से भी बेहतर साबित हो सकते हैं। TU विएना में विकसित और नेचर जर्नल में विस्तार से बताया गया यह एक्सपेरिमेंटल सिस्टम बिना किसी बाहरी मदद के 24 घंटे से ज्यादा समय तक स्थिर रूप से काम करता रहा। यह उपलब्धि हाई-परफॉर्मेंस मेट्रोलॉजी (सटीक माप-जोख की तकनीक) की दिशा में एक बड़ी छलांग है, जिससे विज्ञान और इंजीनियरिंग में फिजिकल क्वांटिटीज (भौतिक राशियों) को ट्रैक करने में बहुत ज्यादा सटीकता मिलने की उम्मीद है।
थोरियम न्यूक्लियस का राज
आम एटॉमिक क्लॉक एटॉमिक न्यूक्लियस के बाहर एनर्जी स्टेट्स के बीच इलेक्ट्रॉनों के ट्रांजिशन (बदलाव) को ट्रैक करती हैं। दशकों से फिजिसिस्ट्स को लगता था कि थोरियम में दूसरे एलिमेंट्स के उलट दो अलग-अलग न्यूक्लियर एनर्जी स्टेट्स होती हैं जो एक-दूसरे के बहुत करीब होती हैं। क्योंकि एनर्जी का अंतर कम होता है, इसलिए साइंटिस्ट्स एक स्टैंडर्ड लेजर का इस्तेमाल करके न्यूक्लियस को एक लेवल से दूसरे लेवल पर स्विच कर सकते हैं। लगभग सभी दूसरे एलिमेंट्स में न्यूक्लियर एनर्जी का अंतर इतना ज्यादा होता है कि वे लेजर लाइट पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते।
इस प्रोजेक्ट को दो साल पहले मिली थी शुरुआती सफलता
इस प्रोजेक्ट में 2024 में अहम शुरुआती सफलताएं मिलीं। अप्रैल 2024 में TU विएन के इंस्टीट्यूट ऑफ एटॉमिक एंड सब-एटॉमिक फिजिक्स के प्रोफेसर थोरस्टेन शुम और PTB ब्राउनश्विग के प्रोफेसर एकेहार्ड पेइक की अगुवाई में एक टीम ने पहली बार दिखाया कि लेजर बीम का इस्तेमाल करके थोरियम न्यूक्लिआई को एक्साइट किया जा सकता है। इसके बाद 2024 में इस संयुक्त टीम ने थोरियम एक्साइटेशन सेटअप को एक पारंपरिक ऑप्टिकल एटॉमिक क्लॉक से जोड़कर समय मापने वाला एक शुरुआती डिवाइस बनाया। उसमें न्यूक्लिआई का इस्तेमाल एक रेफरेंस गाइड के तौर पर किया गया।
खुद को स्टेबल रखने की क्षमता कैसे हासिल करते हैं
असली लक्ष्य एक ऐसा डिवाइस बनाना था जो खुद से काम करे और अपनी गलतियों को खुद ठीक कर सके (ऑटोनॉमस और सेल्फ-करेक्टिंग) हो। प्रोफेसर थॉर्स्टन शुम ने समझाया असल में एक ऐसी न्यूक्लियर घड़ी चाहिए जो खुद को स्टेबल रख सके। इसका बेसिक आइडिया आसान है- आपके पास एक लेजर और थोरियम होता है। लेजर थोरियम न्यूक्लिआई की एनर्जी स्टेट को बदलता है और थोरियम न्यूक्लिआई का इस्तेमाल लेजर की फ्रीक्वेंसी को स्टेबल रखने के लिए किया जाता है। इस सिस्टम के मुख्य हिस्से में थोरियम एटम वाला एक खास क्रिस्टल होता है।
ऐसे लेजर की मदद से काम करता है सिस्टम
एक लेजर लगातार क्रिस्टल पर रोशनी डालता है और रोशनी के ऑसिलेशन का इस्तेमाल घड़ी की टिक-टिक की रफ्तार के तौर पर किया जाता है। जब बीम बिल्कुल सही रेजोनेंस फ्रीक्वेंसी पर होती है तो न्यूक्लिआई लेजर की रोशनी को सोख लेते हैं। यानी फ्रीक्वेंसी एब्जॉर्प्शन सबसे ज्यादा होता है। बीम जरा सा भी हिलने-डुलने पर एब्जॉर्प्शन में साफ तौर पर कमी आती है। इस कमी से एक ऑटोमैटिक करेक्शन होता है। यह लेजर को वापस सही फ्रीक्वेंसी पर ले आता है और घड़ी की टिक-टिक की रफ्तार को बनाए रखता है। इसके लिए किसी बाहरी एटॉमिक घड़ी की जरूरत नहीं पड़ती।
सटीकता और विकास की संभावना
एटॉमिक न्यूक्लिआई पूरे एटम से 10,000 गुना से भी ज्यादा छोटे होते हैं इसलिए बाहरी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक ताकतों से उन पर आसानी से असर नहीं पड़ता। इससे वे लंबे समय तक समय बताने के लिए ज्यादा मजबूत और स्टेबल बन जाते हैं। 24 घंटे की टेस्टिंग के दौरान, प्रोटोटाइप ने दिखाया कि यह हर 30 मिलियन साल में लगभग एक सेकंड की गलती होती है।




















