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मप्र की सियासत के ये हैं असली ‘धरती पकड़’

सियासत के शहंशाह... एक ही क्षेत्र से जीत का रिकॉर्ड,पार्टी बदली पर सीट नहीं
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मप्र की सियासत के ये हैं असली ‘धरती पकड़’

राजीव सोनी-भोपाल। मध्यप्रदेश की सियासत में कई दिग्गज नेता ऐसे भी ‘धरती पकड़’ हैं जिन्होंने एक ही सीट पर अपना पूरा राजनीतिक जीवन बिता दिया। सियासत के ये शहंशाह भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों में मौजूद हैं। लगातार 8- 9 बार एक ही सीट से लोकसभा चुनाव जीतने का रिकार्ड इनके नाम पर दर्ज हो चुका है। कुछ नेता ऐसे भी हैं जिन्होंने सियासी जरूरतों के चलते अपनी पार्टी तो बदल ली लेकिन निर्वाचन क्षेत्र में बदलाव नहीं किया। भाजपा और जनसंघ के संस्थापकों से एक रहे स्व. डॉ लक्ष्मीनारायण पांडे 8 बार एक ही सीट से चुने गए। 1971 में उन्होंने भारतीय जनसंघ,1977 में भारतीय लोकदल और उसके बाद 6 मर्तबा भाजपा के टिकट पर मंदसौर से अपनी विजय पताका फहराई।

दिलीप सिंह भूरिया: झाबुआ सीट पर स्व. भूरिया ने पहले कांग्रेस फिर भाजपा के टिकट पर 9 चुनाव लड़े।उन्हें सफलता 6 बार ही मिली लेकिन उन्होंने सीट नहीं बदली।

फग्गन सिंह कुलस्ते: मंडला सीट से संसद में लगातार आधा दर्जन बार प्रतिनिधित्व कर चुके भाजपा के ट्राइबल फेस केंद्रीय मंत्री कुलस्ते फिर किस्मत आजमा रहे हैं।

कांतिलाल भूरिया: रतलाम-झाबुआ सीट पर 4 बार कांग्रेस से सांसद रहने के बाद इस बार फिर किस्मत आजमा रहे हैं। मंत्री और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं।

सुमित्रा महाजन 'ताई': इंदौर सीट से पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा ताई लगातार 8 बार भाजपा के टिकट पर लोकसभा चुनावों में जीतीं। 1989 से 2014 तक के चुनाव में वह अजेय रहीं।

शिवराज सिंह चौहान: विदिशा से 5 बार सांसद रह चुके पूर्व सीएम चौहान दो दशक के अंतराल बाद फिर वहीं से चुनाव मैदान में हैं। चौहान करीब 18 साल तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे।

ज्योतिरादित्य सिंधिया: गुना सीट पर लगातार 5 बार चुनाव लड़े। 2019 में उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। 2020 में भाजपा में शामिल होने के बाद भाजपा के टिकट पर यह उनका पहला चुनाव है।

कमलनाथ: छिंदवाड़ा से 9 बार सांसद चुने जाने का रिकार्ड पूर्व सीएम कमलनाथ दर्ज कर चुके हैं । यह सीट कांग्रेस का गढ़ है।

सुशील चंद वर्मा: ब्यूरोक्रेट से राजनीति में आए और भोपाल सीट से 4 बार भाजपा के टिकट पर पूर्व सीएस वर्मा सांसद रहे।

गणेश सिंह: सतना सीट पर लगातार 4 लोकसभा चुनाव में विजयी पताका फहराने के बाद फिर मैदान में हैं।

नॉलेज: धरती पकड़ हो गया था काका का उपनाम

चुनावी सियासत मे सबसे पहले ''धरती पकड़ '' शब्द को शोहरत काका जोगिंद्र सिंह (बरेली उप्र) के कारण मिली। उनके साथ यह उपनाम की तरह जुड़ गया था। वह ऐसे नेता थे जिन्हें हर चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा। वह चुनाव जीतने के लिए नहीं बल्कि हारने के लिए ही लड़ते थे। कई राज्यों में जाकर चुनावी नामांकन जमा कर देते थे। निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर उन्होंने 300 से अधिक चुनावों में हार का रिकार्ड बनाया।

परंपरागत सीट हो जाने से बनती है ऐसी स्थिति

दरअसल, पार्टी की परंपरागत सीट हो जाने के कारण ऐसे नेताओं को निर्वाचन क्षेत्र बदलने की जरूरत ही नहीं पड़ी। उन्हें लगातार विजयश्री मिलते रहने से संगठन ने भी बदलाव नहीं किया। हालांकि 1980 और 1984 की इंदिरा लहर इसके अपवाद भी रहे। - गिरजाशंकर, राजनीतिक विश्लेषक

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