
नई दिल्ली। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के तहत किसी गवाह के लिए न्यूनतम आयु की कोई आवश्यकता नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि केवल बाल गवाह की उम्र के आधार पर उसकी गवाही को अविश्वसनीय मानकर खारिज नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने मध्य प्रदेश राज्य बनाम बलवीर सिंह (आपराधिक अपील संख्या 1669/2012) मामले में यह फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए आरोपी बलवीर सिंह की दोषसिद्धि को बहाल कर दिया और निचली अदालत द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को कायम रखा।
क्या है मामला
यह मामला 15 जुलाई 2003 की रात मध्य प्रदेश के सिंघराई गांव में हुई बीरेंद्र कुमारी की हत्या से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी बलवीर सिंह ने अपनी पत्नी का गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी और फिर अपनी बहन की मदद से रातोंरात जल्दबाजी में अंतिम संस्कार कर दिया। घटना तब उजागर हुई जब मृतका के रिश्तेदार भूरा सिंह उर्फ यशपाल को इसकी भनक लगी। उन्होंने शिकायत दर्ज कराई कि उन्होंने मृतका की चीखें सुनी थीं और बाद में उसका अंतिम संस्कार संदिग्ध परिस्थितियों में रात के अंधेरे में किया गया।
मुकदमे के दौरान, मृतका और आरोपी की 7 वर्षीय बेटी रानी मुख्य गवाह बनी। उसने कोर्ट में गवाही दी कि उसने अपने पिता को अपनी मां का गला घोंटते हुए देखा था।
निचली अदालत और हाईकोर्ट के फैसले
- ट्रायल कोर्ट का फैसला (दोषसिद्धि)
ट्रायल कोर्ट ने रानी की गवाही और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर बलवीर सिंह को धारा 302 (हत्या) और धारा 201 (साक्ष्य मिटाने) के तहत दोषी ठहराया। अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
- हाईकोर्ट का फैसला (बरी कर दिया)
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बाल गवाह की विश्वसनीयता पर संदेह जताया और पुलिस द्वारा उसके बयान दर्ज करने में 18 दिन की देरी को आधार बनाते हुए आरोपी को बरी कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रमुख कानूनी प्रश्न
- क्या बाल गवाह को भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत सक्षम गवाह माना जा सकता है?
- क्या पुलिस द्वारा बयान दर्ज करने में देरी से गवाह की गवाही अविश्वसनीय हो जाती है?
- क्या परिस्थितिजन्य साक्ष्य और बाल गवाह की गवाही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त हो सकते हैं?
सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
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गवाह की न्यूनतम आयु की कोई आवश्यकता नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 118 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि गवाह के लिए कोई न्यूनतम आयु निर्धारित नहीं की गई है।
“केवल कम उम्र के आधार पर बाल गवाह की गवाही को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता। अदालत को उसकी बौद्धिक क्षमता, आचरण और सत्यनिष्ठा का आकलन करना चाहिए।”
कोर्ट ने अपने पूर्व के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि बच्चा सवालों को समझने और तर्कसंगत उत्तर देने में सक्षम है, तो उसकी गवाही को स्वीकार किया जाना चाहिए।
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पुलिस द्वारा बयान दर्ज करने में देरी हमेशा गवाह को अविश्वसनीय नहीं बनाती
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस निष्कर्ष को अस्वीकार कर दिया, जिसमें पुलिस द्वारा रानी का बयान 18 दिन बाद दर्ज करने को संदेहास्पद बताया गया था।
“बयान दर्ज करने में देरी का मतलब यह नहीं है कि गवाह की गवाही झूठी है, खासकर जब गवाह एक बच्चा हो, जिसने हाल ही में अपने माता-पिता में से एक को खो दिया हो।”
अदालत ने कहा कि कोर्ट को प्रक्रियागत खामियों के बजाय गवाह की समग्र विश्वसनीयता पर ध्यान देना चाहिए।
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परिस्थितिजन्य साक्ष्य और बाल गवाह की गवाही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि यदि परिस्थितिजन्य साक्ष्य और बाल गवाह की गवाही आपस में मेल खाती है, तो वे अभियोजन पक्ष के मामले को मजबूत कर सकते हैं।
“अदालतों को महत्वपूर्ण साक्ष्य को केवल इसलिए नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि एकमात्र चश्मदीद गवाह एक बच्चा है। यदि बाल गवाह विश्वसनीय है और उसकी गवाही परिस्थितिजन्य साक्ष्य से मेल खाती है, तो यह दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त हो सकता है।”
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि सिर्फ इसलिए कि एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी गवाह एक बच्चा है, अभियोजन की पूरी कहानी को खारिज नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि बहाल की
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए बलवीर सिंह की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को बहाल कर दिया।
“हाईकोर्ट ने केवल प्रक्रियात्मक चिंताओं के आधार पर एक विश्वसनीय गवाही को खारिज करके गलती की थी।”
सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों के लिए ‘बाल गवाहों की आवाज की रक्षा करने’ की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि प्रक्रियात्मक तकनीकीताओं के कारण अपराधी को सजा से बचने का अवसर नहीं मिलना चाहिए।
न्यायिक व्यवस्था में इस फैसले का महत्व
यह निर्णय बाल गवाहों की गवाही की विश्वसनीयता को लेकर स्पष्ट मार्गदर्शन प्रदान करता है। यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 118 की व्याख्या को स्पष्ट करता है कि बाल गवाह की गवाही को केवल उम्र के आधार पर अस्वीकार नहीं किया जा सकता। यह अदालतों को निर्देश देता है कि वे अभियोजन की पूरी कहानी को सिर्फ इस आधार पर खारिज न करें कि गवाह एक बच्चा है।
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