
प्रीति जैन- तमिलनाडु के सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने काम के दबाव से परेशान होकर खुदकुशी की तो वहीं पुणे की चार्टर्ड अकाउंटेंट ने कथित तौर पर वर्कलोड के कारण खुदकुशी की। काम के दवाब से जूझ रहे युवाओं के बीच सुसाइड के मामले बढ़ने लगे हैं। इन युवाओं के परिवारजनों का कहना है कि कंपनी जॉइन करने के कुछ ही महीनों के भीतर उनके बच्चों की भूख-नींद सब खत्म होने लगी थी, जिसका ये अंजाम हुआ। वहीं साइकेट्रिस्ट के मुताबिक वर्कलोड ही सिर्फ आत्महत्या का कारण बने यह कहना ठीक नहीं होगा। सुसाइड हमेशा मल्टी फैक्टोरियल होती है, जिसमें जेनेटिक, बायोलॉजिकल फैक्टर, सोशल इश्यूज, पर्सनालिटी इश्यूज भी होते हैं।
एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स सिखाएं लाइफ स्किल्स
साइकोलॉजिस्ट्स के मुताबिक स्कूल व कॉलेज की पढ़ाई के दौरान स्ट्रेस को मैनेज करना व लाइफ स्किल्स सिखाया जाना जरूरी है। कॉपोर्रेट कल्चर के प्रेशर से अवगत करना एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स की भी जिम्मेदारी है। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, वर्कलोड से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
शाम का समय सेहत और परिवार के लिए होता है
मैं कई साल जॉब की लेकिन वर्क प्रेशर और फैमिली की चिंता के बीच लगा कि अब बस बहुत हुआ। अब अपना खुद का व्यवसाय होने के बावजूद मैं सुबह 10.30 से शाम को 7 बजे तक ही काम करता हूं और इस दौरान फोन कॉल्स या चैट के रिप्लाई बहुत जरूरी होने पर ही देता हूं। शाम के बाद का यह वक्त मैंने अपनी सेहत और परिवार के लिए रखा है। -अजय मेघानी, आंत्रप्रेन्योर
किसी भी सुसाइड का एक कारण नहीं होता। सभी के पर्सनालिटी इश्यूज, सोशल फैक्टर, जेनेटिक बायोलॉजिकल फैकटर आदि अलग होते हैं। सिर्फ वर्कलोड आत्महत्या कारण नहीं बनता, बल्कि यह मल्टी फैक्टोरियल है जिसके कारण व्यक्ति जॉब छोड़ने की बजाए खुद को खत्म करता है। लोगों को मनोचिकित्सक से मदद लेना सीखना होगा। -डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी, मनोचिकित्सक
डब्लूएचओ के अनुसार एक व्यक्ति को सप्ताह में औसतन 35-40 घंटे वर्क करना चाहिए। सप्ताह में कुल 168 घंटे होते हैं। प्रोफेशनल काम के कुल घंटे इसके एक चौथाई से ज्यादा नहीं होने चाहिए। हर व्यक्ति अपनी पर्सनालिटी के हिसाब से वर्कलोड को मैनेज करता है। लंबे समय तक तनाव डिप्रेशन का कारण बनता है। -डॉ. शिखा रस्तोगी, साइकोलॉजिस्ट