
प्रभा उपाध्याय-इंदौर। आजकल के युवाओं में एक अलग ट्रेंड देखने को मिल रहा है जो पार्टी और शराबखोरी से दूर सामाजिक कार्यों में अपना समय व्यतीत कर असहाय लोगों की मदद कर रहे हैं, लेकिन इनकी संख्या केवल 10 फीसदी ही है। अब इंदौर की ही बात करें तो शहर के कुछ युवा ना केवल भूखों को भोजन करा रहे हैं, बल्कि शिक्षा के साथ दवाइयों में भी मदद कर रहे है।
यह पहल शहर के विनय तिवारी और उनकी चार लोगों की टीम ने शुरू की है। वे पिछले चार साल से बस्तियों में सड़कों पर और मंदिरों के बाहर बहुत से ऐसे गरीब, असहाय, अपाहिज या फिर मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों के लिए हफ्ते में प्रति मंगलवार भोजन की व्यवस्था करते है। इस पर वह अपनी कमाई का दो हजार से ढाई हजार रुपए सप्ताह के खर्च कर चार से पांच सौ लोगों को भोजन कराते हैं।
24 वर्षीय विनय के साथ उनके ही हम उम्र तनु मालवीय, राधिका जैन, राजेंद्र मालवीय और अंजली काम करते हैं। इसमें राधिका और अंजली गरीब बस्तियों में पढ़ने वाले बच्चों को लिए स्टेशनरी की व्यवस्था करते हैं। इस पर लगभग चार से पांच हजार रुपए खर्च करते हैं। वहीं तरुण मालवीय बीमारी से जूझ रहे गरीबों की महंगी दवाइयां लाकर मदद करते हैं। इस पर वह करीब पांच से छह हजार तक खर्च कर देते हैं। कई बार एक माह में 30 से 35 हजार दवाइयों का बिल बन जाता है।
ऐसे हुई शुरुआत
विनय तिवारी ने बताया चार साल पहले की बात है, जब एक गरीब मां ने एमवाय अस्पताल के बाहर अपने बच्चे को इसलिए मार दिया, क्योंकि वह उसे खिलाने में सक्षम नहीं थी। उसका बच्चा भूख से तड़प रहा था। यह घटना मेरे मन में घर कर गई। हम भी आर्थिक रूप से बहुत अधिक सक्षम तो नहीं थे, पर तभी तय कर लिया कि हफ्ते में एक दिन जरूर जरूरतमंद गरीब लोगों को अच्छा भोजन कराएंगे। अगर कभी भगवान ने चाहा तो हम इस काम को नियमित भी करेंगे।
प्रति मंगलवार अलग-अलग सामग्री का वितरण : विनय ने बताया कि प्रति मंगलवार जो खाना बनता है उसके पहले भगवान को भोग लगाते हैं उसके बाद गरीबों में प्रसाद स्वरूप बांटा जाता है। कई बार खिचड़ी, दाल-चावल, रोटीस ब्जी देते है, लेकिन किसी का बर्थ- डे रहता है तो खीर भी बांटी जाती है। दो माह में एक बार चार से पांच हजार लोगों को खाना खिलाते हैं।
अब हफ्ते में सातों दिन सेवा का है मकसद: तिवारी के मुताबिक इस काम में राजू भैया उनकी बहुत मदद करते हैं। उन्हीं के घर पूरा खाना तैयार होता है और इसके बाद मंदिरों के बाहर और अस्पतालों के बाहर बैठे गरीबों निसहायों तक पहुंचाया जाता है। तिवारी का कहना है कि इन चार सालों के दौरान कई युवा भी उनके साथ जुड़े।