
नई दिल्ली। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कच्चाथीवू मसले पर प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी बात रखी। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कच्चाथीवू द्वीप मामले पर कांग्रेस और डीएमके पर निशाना साधा। उन्होंने विस्तार से इस मामले पर जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ये ऐसा मुद्दा नहीं है, जो आज अचानक उठा है। ये संसद और तमिलनाडु में लगातार उठता आ रहा है। श्रीलंका को कच्चाथीवू द्वीप कैसे दिया गया इसके बारे में जनता को जानने का अधिकार है।
कच्चाथीवू पर जयशंकर ने कहीं ये बातें
जयशंकर ने कच्चाथीवू मसले पर प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस द्वीप से जुड़ी सारी जानकारी दी। उन्होंने कहा इस मसले पर कई बार बहस हुई। मेरे रिकॉर्ड के अनुसार, इस मसले पर मैंने खुद मौजूदा मुख्यमंत्री को 21 बार जवाब दिया है।
कांग्रेस और डीएमके पर साधा निशाना
पिछले 20 साल में 6184 भारतीय मछुआरों को श्रीलंका ने पकड़ लिया था। इसी के साथ भारत की मछली पकड़ने वाली 1175 नावें सीज भी की गईं थी। कई पार्टियों ने लगातार कच्चाथीवू और मछुआरों का मसला संसद में उठाया लेकिन कांग्रेस और डीएमके ऐसा दिखा रही हैं कि उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है और यह अभी अभी का मसला है।
जनता को है जानने का अधिकार
जयशंकर आगे बोले, जनता को ये जानने का अधिकार है कि 1974 में कच्चाथीवू को श्रीलंका को कैसे दिया गया। यह मसला वो 2 पार्टियां उठाती हैं, जिन्होंने इसे खुद अंजाम दिया है। ये लोग वस कच्चाथीवू मुद्दा उठाते हैं… बैठकर बयान देते हैं, लेकिन उन मछुआरों को कैसे छुड़ाया जाता है, ये हम जानते हैं।
1974 के समझौते की जयशंकर ने बताई तीन कंडीशन
जयशंकर ने 1974 में हुए समझौते की कंडीशन के बारे में बात करते हुए बताया कि, 1974 में इंडिया और श्रीलंका ने एक समझौता किया था। जिसमें दोनों देशों के बीच समुद्री सीमा तय की गई। इस सीमा को तय करते वक्त कच्चाथीवू को श्रीलंका में दे दिया गया। जिसके लिए 3 कंडीशन रखीं गईं थीं।
पहली- दोनों देशों का अपनी समुद्री सीमा पर पूरा अधिकार और संप्रभुता होगी।
दूसरी- कच्चाथीवू का इस्तेमाल भारतीय मछुआरे भी कर सकेंगे और इसके लिए भारतीयों को किसी ट्रैवल डॉक्यूमेंट की जरूरत नहीं होगी।
तीसरी- दोनों देशों की नौकाएं एक-दूसरे की सीमा में वो यात्राएं कर सकेंगी जो वो परंपरागत रूप से पहले से करती आ रही हैं।
यह समझौता संसद में रखा गया। तब के विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह जी ने 23 जुलाई 1974 को संसद को भरोसा दिलाया था। उनके स्टेटमेंट में लिखा था, मुझे विश्वास है कि भारत और श्रीलंका के बीच सीमाओं का तय न्यायसंगत है और सही है। इस समझौते को करते वक्त दोनों देशों को भविष्य में मछली पकड़ने, धार्मिक कार्य करने और नौकाएं चलाने का अधिकार रहेगा।
जयशंकर ने बताया प्रेस कॉन्फ्रेंस का मकसद
इस प्रेस कॉन्फ्रेंस का मकसद बताते हुए जयशंकर बोले, हम मानते हैं कि जनता को ये जानने का अधिकार है कि 1974 में कच्चाथीवू को कैसे दे दिया गया। समझौता कैसे हुआ। मछुआरों के मसले को किस तरह से देखा गया।
हम जानते हैं इसे जनता से किसने छिपाया : जयशंकर
जयशंकर ने आगे कहा, हम आज 2 एग्रीमेंट की बात कर रहे हैं। RTI के जरिए ये दस्तावेज हमें मिले हैं। पहली रिपोर्ट विदेश मंत्रालय की 1968 की एक कमेटी की रिपोर्ट है। दूसरा दस्तावेज तब के विदेश सचिवों और तब के तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के बीच हुई बातचीत का रिकॉर्ड है, जो की जून 19, 1974 की है।
कच्चाथीवू का मुद्दा लंबे समय तक जनता से छिपाया गया। कौन जिम्मेदार है, कौन इसमें शामिल है, किसने इसे छिपाया। हम जानते हैं। आज भी मछुआरों को पकड़ा जा रहा है, नावों को पकड़ा जा रहा है। आज भी यह मसला संसद में उठता है। यह मसला वो 2 पार्टियां उठाती हैं, जिन्होंने इसे अंजाम दिया है।
पीएम मोदी ने रविवार को कच्चाथीवू का मसला उठाया था
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को एक RTI रिपोर्ट का हवाला देकर कहा था कि कांग्रेस ने भारत के रामेश्वरम के पास मौजूद कच्चाथीवू द्वीप श्रीलंका को सौंप दिया था। हर भारतीय इससे नाराज है और यह तय हो गया है कि कांग्रेस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
285 एकड़ में फैला है कच्चाथीवू, रामेश्वरम से 19 KM दूर है
भारत के तमिलनाडु और श्रीलंका के बीच काफी बड़ा समुद्री क्षेत्र है। इस समुद्री क्षेत्र के पास कई सारे द्वीप हैं, जिसमें से एक द्वीप का नाम कच्चाथीवू है। कच्चाथीवू 285 एकड़ में फैला एक द्वीप है। ये द्वीप बंगाल की खाड़ी और अरब सागर को जोड़ता है। ये द्वीप 14वीं शताब्दी में एक ज्वालामुखी विस्फोट के बाद बना था। जो रामेश्वरम से करीब 19 किलोमीटर और श्रीलंका के जाफना जिले से करीब 16 किलोमीटर की दूरी पर है।
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