
हर्षित चौरसिया-जबलपुर। करीब-करीब विलुप्त हो चुके पीले सेमल को संरक्षित करने में दो सालों की अथक मेहनत आखिरकार सफल रही। राज्य वन अनुसंधान केंद्र (एसएफआरआई) जबलपुर के वैज्ञानिक द्वारा तैयार किए गए इस पौधे की मांग अब देश भर में है। खुशी की बात ये है कि उप्र, दिल्ली, गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़ सहित प्रदेश के ग्वालियर, मंडला में भेजे गए 25 पौधों में भी फूल आने लगे।
ग्राफ्टिंग तकनीक से तैयार किए 40 पौधे : संस्थान के वैज्ञानिक डॉक्टर उदय होमकर ने बताया कि यह पौधा प्रदेश में सिर्फ जबलपुर में ही बचा हुआ था। एक साल में 25 पौधों को ग्राफ्टिंग तकनीक और नर्सरी में विशेष देखभाल से तैयार किया गया है। वर्तमान में 15 नए पौधे भी तैयार किए गए हैं। मप्र के अलावा केवल आंध्र और महाराष्ट्र में इसके पौधे होने की पुष्टि हुई है।
आयुर्वेदिक गुण : इस पेड़ का हर हिस्सा काम का
शासकीय आयुर्वेद कॉलेज जबलपुर के द्रव्य गुण विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉक्टर बरखा ठाकुर ने बताया कि सेमल को आयुर्वेद में कूटशाल्मलि कहते हैं। इसकी जड़, फल, बीज और कांटे औषधीय गुणों से भरपूर हैं, जो कि कई बीमारियों को ठीक करने में सहायक है।
- महिलाओं के प्रदर रोग, पुरुषों में पौरुष शक्ति को बढ़ाने के लिए दवा के रूप में उपयोग किया जाता है।
- इसकी गोंद का प्रयोग छोटे बच्चों के बिस्तर में पेशाब करने की बीमारी को ठीक करने में होता है।
- इसके कांटों का प्रयोग मुहांसे, झाइयां, वर्ण विकार के उपचार में किया जाता है।
इसलिए बड़ी उपलब्धि
शासकीय होमसाइंस कॉलेज के बॉटनी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉक्टर अनुराधा दवे ने बताया कि इसका वानस्पतिक नाम सीवा पेन्टाडरलिन है। इसका अंग्रेजी नाम वाइट सिल्क कॉटन ट्री है। आमतौर पर लाल रंग के सेमल के वृक्ष पाए जाते हैं। पीले रंग के फूल वाले पौधे दुर्लभ वैरायटी के हैं। रंग में परिवर्तन का मुख्य कारण पर्यावरण में जीन्स बदलाव है। जबलपुर के वैज्ञानिक इसे संरक्षित करने में सफल रहे। यह प्रदेश ही नहीं देश के लिए बड़ी उपलब्धि है।
एक देश के झंडे पर भी है
- यह वृक्ष इक्वेटोरियल गिनी के झंडे पर दिखाई देता है।
- पीले सेमल को रेशम कपास वृक्ष या सेमल के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया,जावा बोर्नियो, सुमात्रा, फिलीपींस और ऑस्ट्रेलिया में पाया जाता है ।
यहां पाया जाता है
- भारत : पहले देश के अनेक क्षेत्रों में मिलता था यह पेड़।
- ऑस्ट्रेलिया : क्वींसलैंड में
- चीन के युनान प्रांत में भी मिलता है
मूलत: यहां का है पेड़ : यह मूल रूप से दक्षिणी और पूर्वी एशिया तथा उत्तरी ऑस्ट्रेलिया का है। इसके रेशे 100 प्रतिशत सेल्यूलोज से बने होते हैं। इनका उपयोग स्लीपिंग बैग व जीवन रक्षक उपकरणों में इन्सुलेशन के लिए होता है।
जैव विविधता में महत्व
इसका रंग पीला होने के कारण कीटों और पक्षियों के लिए भोजन और आवास का अच्छा स्थान होता है। सेमल की छाल, जड़, फल, बीज और कांटे से दवाइयां बनाई जाती हैं। ऐसे में इस दुर्लभ प्रजाति का संरक्षण करना आवश्यक है। इसे संरक्षित करने वालों को सम्मानित हो। – शैलेंद्र भवादिया, पर्यावरणविद