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एस जयशंकर बोले- भारत को सिर्फ मिडिल पावर कहना सही नहीं, दुनिया के केंद्र में प्रभाव रखने वाली शक्ति है देश

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भारत को केवल मिडिल पावर मानने पर सवाल उठाए। ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में उन्होंने भारत की आर्थिक ताकत, वैश्विक प्रभाव और बदलती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर अपनी बात रखी।
एस जयशंकर बोले- भारत को सिर्फ मिडिल पावर कहना सही नहीं, दुनिया के केंद्र में प्रभाव रखने वाली शक्ति है देश
भारत को सिर्फ मिडिल पावर कहना सही नहीं

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा है कि भारत को केवल ‘मिडिल पावर’ यानी मध्यम शक्ति के रूप में देखना उसकी क्षमताओं को सीमित करके आंकने जैसा होगा। उनके मुताबिक भारत को ‘पावर इन द मिडिल’ यानी ऐसी शक्ति के रूप में समझना चाहिए, जिसका ग्लोबल व्यवस्था के केंद्र में महत्वपूर्ण प्रभाव हो। एक पैनल चर्चा के दौरान जयशंकर ने भारत की विशाल आबादी, करीब 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और विकास की संभावनाओं का उल्लेख किया। जयशंकर ने कहा कि बदलती ग्लोबल व्यवस्था में देशों के बीच संबंध केवल उनकी पारंपरिक शक्ति के आधार पर तय नहीं होंगे। देश अपने हितों और क्षमताओं के अनुसार फैसले लेंगे, अपनी नीतियां बनाएंगे और दूसरे देशों के साथ आपसी सहमति के आधार पर समझौते करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि ग्लोबल प्रतिस्पर्धा में उन संसाधनों, व्यवस्थाओं और नेटवर्क का महत्व बढ़ रहा है जिनके जरिए एक देश दूसरे पर दबाव बना सकता है। इस संदर्भ में उन्होंने दुर्लभ खनिजों के साथ वित्तीय व्यवस्था और प्रतिबंधों का भी जिक्र किया।

भारत को मिडिल पावर कहना क्यों सहज नहीं?

ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में चर्चा के दौरान जयशंकर से पूछा गया कि भारत को ‘मिडिल पावर’ कहे जाने पर उन्हें आपत्ति क्यों होती है। इस पर उन्होंने कहा कि भारत को केवल मध्यम शक्ति कहने के बजाय ‘पावर इन द मिडिल’ के रूप में देखना चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की परिभाषा का उल्लेख करते हुए कहा कि मिडिल पावर ऐसे देशों को कहा जा सकता है, जिनके पास दूसरों को सशक्त बनाने की क्षमता होती है। जयशंकर के अनुसार भारत की भूमिका को केवल मध्यम शक्ति की पारंपरिक श्रेणी में रखकर नहीं समझा जा सकता। विदेश मंत्री ने भारत की जनसंख्या, अर्थव्यवस्था और विकास की संभावनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है और उसकी अर्थव्यवस्था का आकार करीब 4 ट्रिलियन डॉलर है। ऐसे में भारत की क्षमताओं और ग्लोबल भूमिका को देखते हुए उसे केवल मिडिल पावर कहना उसकी व्यापक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शाता।

बदलती दुनिया में देश अपने हितों के आधार पर लेंगे फैसले

जयशंकर ने कहा कि ग्लोबल व्यवस्था में बदलाव के साथ मध्यम शक्तियां भी अपने विवेक से फैसले लेंगी। वे अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देंगी, अपनी नीतियां तय करेंगी और फिर दूसरे देशों के साथ सहमति के आधार पर समझौते करेंगी। उनके मुताबिक देशों के बीच रिश्ते इस बात से भी तय होंगे कि बातचीत की मेज पर प्रत्येक देश क्या योगदान दे सकता है। कोई देश किसी क्षेत्र में सहयोग करने की क्षमता रखेगा, जबकि दूसरा किसी अन्य क्षेत्र में मदद कर सकता है। इस तरह दोनों पक्ष अपनी जरूरतों और क्षमताओं के आधार पर साझेदारी विकसित कर सकते हैं। ऐसी व्यवस्था में व्यापार, साझा परियोजनाओं और आपसी सहयोग के नए रास्ते खुल सकते हैं। जयशंकर की बात का प्रमुख आधार यह था कि देशों के रिश्तों को केवल उनकी पारंपरिक शक्ति के पैमाने से नहीं बल्कि उनके योगदान और आपसी जरूरतों के आधार पर भी समझना होगा।

‘चोक पॉइंट्स’ के जरिए भी बनता है ग्लोबल दबाव

विदेश मंत्री ने ग्लोबल प्रतिस्पर्धा के एक अन्य पहलू पर चर्चा करते हुए कहा कि दुनिया में कुछ महत्वपूर्ण संसाधनों, व्यवस्थाओं और नेटवर्क पर नियंत्रण भी देशों को प्रभाव डालने की ताकत देता है। उन्होंने इसे ‘चोक पॉइंट्स’ की दुनिया के संदर्भ में समझाया। चोक पॉइंट्स से आशय ऐसे महत्वपूर्ण बिंदुओं या व्यवस्थाओं से है, जिन पर किसी देश या समूह का नियंत्रण दूसरे देशों की गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है। उदाहरण के तौर पर, दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति पर नियंत्रण उद्योगों और तकनीक से जुड़े क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है। इसी तरह वित्तीय नेटवर्क और आर्थिक प्रतिबंध भी देशों पर दबाव बनाने के साधन बन सकते हैं। जयशंकर ने कहा कि आमतौर पर चोक पॉइंट्स की चर्चा में रेयर अर्थ एलिमेंट्स यानी दुर्लभ खनिजों का उदाहरण दिया जाता है, लेकिन वित्तीय व्यवस्था और प्रतिबंधों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। वित्तीय नेटवर्क या प्रतिबंधों का इस्तेमाल किसी देश की आर्थिक गतिविधियों और दूसरे देशों के साथ उसके संबंधों पर असर डालने के लिए किया जा सकता है।

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समझौतों और सहयोग से तय होंगे देशों के रिश्ते

जयशंकर के अनुसार भविष्य में ग्लोबल प्रतिस्पर्धा का एक बड़ा आधार यह होगा कि कोई देश बातचीत की मेज पर क्या लेकर आता है। देशों के पास उपलब्ध संसाधन, तकनीक, आर्थिक क्षमता और दूसरे क्षेत्रों में योगदान देने की योग्यता उनके आपसी रिश्तों को प्रभावित करेगी। उन्होंने समझाया कि देश आपसी समझौतों के तहत अलग-अलग क्षेत्रों में सहयोग कर सकते हैं। एक देश किसी क्षेत्र में योगदान देगा, तो दूसरा किसी अन्य क्षेत्र में मदद करेगा। इस तरह साझा परियोजनाओं, व्यापार और विकास से जुड़े समझौते आगे बढ़ सकते हैं। इस व्यवस्था में किसी एक देश की भूमिका हर क्षेत्र में समान नहीं होगी। किसी देश के पास तकनीक या संसाधन हो सकते हैं, जबकि दूसरे के पास किसी अन्य क्षेत्र में उपयोगी क्षमता हो सकती है। ऐसे में आपसी जरूरतें और योगदान सहयोग की शर्तें तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

बातचीत की मेज रहेगी, लेकिन बदल सकता है प्रभाव का संतुलन

विदेश मंत्री ने कहा कि भविष्य में देशों के बीच बातचीत और समझौतों की प्रक्रिया जारी रहेगी, लेकिन इसमें भाग लेने वाले देशों की स्थिति और उनके पास उपलब्ध संसाधनों में बदलाव हो सकता है। कौन-सा देश किसके साथ बातचीत करेगा और किसी समझौते में उसका कितना प्रभाव होगा, यह भी उसकी क्षमताओं और योगदान पर निर्भर कर सकता है। जयशंकर के मुताबिक ग्लोबल व्यवस्था को केवल मध्यम शक्तियों के नजरिये से देखना पर्याप्त नहीं है। देशों के बीच प्रतिस्पर्धा के साथ सहयोग के नए तरीके भी सामने आ रहे हैं। इस दौरान आर्थिक क्षमता, जरूरी संसाधनों तक पहुंच और विभिन्न क्षेत्रों में साझेदारी की भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहेगी।

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ग्लोबल बदलावों को केवल नकारात्मक नजरिये से न देखें

जयशंकर ने ग्लोबल बदलावों को लेकर निराशावादी नजरिया अपनाने से बचने की बात कही। उन्होंने कहा कि दुनिया में बदलाव की प्रक्रिया पहले से जारी थी, लेकिन अब यह ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है जिसकी पहले शायद कल्पना नहीं की गई थी। उनके अनुसार देशों के संबंधों और ग्लोबल प्रतिस्पर्धा का स्वरूप बदल रहा है। ऐसे में इन बदलावों को केवल नकारात्मक रूप में देखने के बजाय यह समझना जरूरी है कि देश अपने हितों, क्षमताओं और आपसी सहयोग के आधार पर नई व्यवस्थाएं बना रहे हैं।

Dr. Sumit  Shrivastava
By Dr. Sumit Shrivastava

सुमित श्रीवास्तव एक अनुभवी मीडिया प्रोफेशनल, बिजनेस पत्रकार और शोधकर्ता हैं। मास कम्युनिकेशन में M.P...

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