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इंदौर-भोपाल को दो दशकों से नहीं मिला केंद्रीय मंत्री, जबलपुर को इंतजार, विंध्य भी खाली हाथ

इंदौर से शंकर लालवानी की देश में सबसे बड़ी जीत फिर भी नहीं मिला मौका

नवीन यादव-इंदौर। प्रदेश की सत्ता भोपाल से चलती है, इंदौर से देश में लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी जीत होती है और जबलपुर सीट भाजपा का गढ़ बनी हुई है पर इन तीनोें जगहों के सांसद करीब दो दशक से केंद्र में मंत्री नहीं बन पाए हैं। इससे भी बुरा हाल जबलपुर का है, जहां पर आजादी के बाद से ही आज तक कोई सांसद केन्द्र में मंत्री नहीं बना है। फिर चाहे वह भाजपा का हो या कांग्रेस का। इस बार भी केन्द्रीय मंत्रिमंडल में प्रदेश के इन तीन प्रमुख शहरों के सांसदों को प्रतिनिधित्व नहीं मिलने से अब इंतजार और बढ़ गया है।

इस बार प्रदेश के कोटे से 6 मंत्री बनाए गए हैं लेकिन इन 6 मंत्रियों में भोपाल, इंदौर, विंध्य और जबलपुर के सांसदों का नाम नहीं है। पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में इंदौर से सभी 9 सीटें इंदौर से भाजपा ने ही जीती थी। यही हाल भोपाल का है जहां 1989 से भाजपा ही लोकसभा सीट जीतती आ रही है।

ग्वालियर रहा भाग्यशाली

केन्द्र में मंत्री बनाने के मामले में ग्वालियर की किस्मत अच्छी रही है। माधव राव सिंधिया केन्द्र में सालों तक मंत्री रहे, इसके अलावा नरेन्द्र सिंह तोमर भी केन्द्र में मंत्री रहे हैं। ग्वालियर संभाग से ज्योतिरादित्य सिंधिया मोदी सरकार में दूसरी बार मंत्री बने हैं।

भोपाल को भी तवज्जो नहीं

भोपाल से1977 आरिफ वेग के बाद कुछ समय के लिए पूर्व सीएम उमा भारती तत्कालीन अटल सरकार में 1999 से 2004 तक केन्द्र में मंत्री रहीं। इसके बाद से भोपाल खाली हाथ है। 2019 में प्रज्ञा ठाकुर ने दिग्विजय सिंह को हराया था फिर भी भोपाल को जगह नहीं मिली।

इंदौर 2004 से खाली हाथ

इंदौर से पूर्व लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन 1999 से 2004 तक अटल सरकार में पेट्रोलियम, मानव संसाधन और दूरसंचार राज्यमंत्री की भूमिका निभा चुकी हैं। इसके बाद से शहर को कोई मंत्री नहीं मिला।

सावित्री ठाकुर से मालवा निमाड़ को साधने का प्रयास

धार ऐसी लोकसभा है जो इंदौर, रतलाम, खरगोन, उज्जैन से जुड़ी हुई है। ठाकुर आदिवासी समाज से हैं। उनके केंद्रीय मंत्री बनने से आसपास के क्षेत्र पर मजबूत प्रभाव पड़ेगा। धार लोकसभा की एक विस इंदौर जिले में भी आती है। इससे एक हिस्सा मंत्री का लोस क्षेत्र रहेगा।

जबलपुर क्षेत्र से आज तक एक भी केंद्रीय मंत्री नहीं

कार्यकाल चाहे कांग्रेस का रहा हो या भाजपा का, जबलपुर से एक भी मंत्री केन्द्र में केबिनेट या राज्य स्तर पर नहीं मिल सका है। 1957 से लेकर 1971 तक के लोकसभा के 4 कार्यकाल में कांग्रेस से सेठ गोविंददास सांसद चुने गए मगर उन्हें मंत्री पद नहीं मिला। 1996 से भाजपा का इस सीट पर कब्जा है, लेकिन अब तक कोई मंत्री नहीं बना है।

विंध्य ने भाजपा को चार सांसद दिए, पर मंत्री पद नहीं मिला

विंध्य क्षेत्र में भाजपा का जनाधार लगातार बढ़ रहा है। वर्तमान में रीवा, सतना, सीधी और शहडोल ने भाजपा को ही सांसद दिए हैं। लेकिन, इस क्षेत्र से भाजपा सरकार के किसी भी कार्यकाल में किसी को मंत्री पद नहीं मिला है। शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया और वीरेंद्र कुमार के केंद्रीय मंत्री बनने के बाद वरिष्ठता में सतना के सांसद हैं जो पांचवीं बार निर्वाचित हुए हैं और वरिष्ठता की लिस्ट में शामिल हैं परंतु उन्हें मंत्री पद नहीं मिला है। विंध्य से वरिष्ठता में दूसरे नंबर पर रीवा के जनार्दन मिश्रा तीसरी बार के सांसद हैं।

वरिष्ठता, क्षेत्रीय और जातीय संतुलन बड़ा कारण

मोदी मंत्रिमंडल में मध्यप्रदेश के तीन बड़े शहरों – इंदौर, भोपाल, जबलपुर के सांसदों को जगह ना मिल पाने का कारण वरिष्ठता, क्षेत्रीय और जातीय संतुलन दिखाई पड़ रहा है। भोपाल के सांसद आलोक शर्मा पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए हैं और जबलपुर के सांसद आशीष दुबे भी पहली बार के सांसद हैं। भोपाल के पास की ही सीट विदिशा से पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान छठवीं बार सांसद बने हैं। वहीं वीरेंद्र कुमार 1996 से लगातार सांसद हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया की भी वरिष्ठता है। इंदौर के सांसद शंकर लालवानी दूसरी सांसद बने हैं लेकिन पास की धार लोकसभा सीट से दूसरी बार की सांसद और आदिवासी नेत्री सावित्री ठाकुर को मंत्रिमंडल में जगह मिल गई तो मालवा-निमाड़ को प्रतिनिधित्व मिल गया। वैसे पहले कई बार इंदौर और भोपाल के सांसद केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह पाते रहे हैं। -मुकेश तिवारी, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक

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