
राजीव सोनी भोपाल। मंदसौर की 56 महिलाएं कभी घर से निकलने में भी डरती थीं। पैसों के लिए मोहताज थीं। बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और भविष्य की चिंता उन्हें परेशान करती थी। एक स्थानीय संस्था ने उन्हें ई-रिक्शा के रूप में अपने पैरों पर खड़े होने का मौका क्या दिया? उनके सपनों को तो मानो पंख ही लग गए। 4-6 महीने में ही ये सभी अबला से सबला बन बैठीं। इनमें तीन महिलाएं दिव्यांग भी हैं। ज्यादातर महिलाएं घरेलू काम से 4-5 हजार रुपए ही कमाती थीं, लेकिन अब 6 महीने में ही उनके दिन फिर गए। रोज हजार-बारह सौ रुपए की कमाई होने लगी, अब बच्चे के लिए 100 रुपए की टॉफी खरीद कर देने में भी संकोच नहीं होता। रात 11 बजे तक शहर में उनके रिक्शा सवारियों को लेकर दौड़ रहे हैं। दिव्यांग ज्योति भाटी, ज्योति नामदेव, रामकन्या या फिर सविता केटवास अथवा अर्पिता हों उनके कॉन्फिडेंस का स्तर देखते ही बनता है। अर्पिता और ज्योति कहती हैं कि हम लोगों को नई जिंदगी मिल गई। सिसोदिया और गनेड़ीवाल ट्रस्ट हम लोगों के लिए देवदूत बनकर आए, हमारे पास अब हर खुशी है।
ट्रस्ट ने दिए 1.75 करोड़ रु.
आपदा को अवसर में बदलने की यह कहानी कोविड के दौरान शुरू हुई। महिला सशक्तिकरण का यह नवाचार स्थानीय विधायक यशपाल सिंह सिसोदिया और गनेड़ीवाल चैरिटेबल ट्रस्ट के संचालक प्रदीप गनेड़ीवाल के दिमाग की उपज है। दिव्यांग शिविर में महिलाओं की बदहाली देखकर ही यह विचार उपजा। महिलाओं को ई-रिक्शा खरीदने के लिए ट्रस्ट ने पौने दो करोड़ रुपए से ज्यादा उपलब्ध कराए। 200 आवेदनों में से 56 महिलाओं का चयन किया, जिनमें विधवा, परित्यक्ता और दिव्यांग को प्राथमिकता दी। 56 रिक्शा सड़कों पर दौड़ रहे हैं, 13 रिक्शा और खरीदे हैं। उनके लिए पात्र महिलाओं की ट्रेनिंग चल रही है।