
नई दिल्ली। देश के 14वें प्रधानमंत्री और अर्थशास्त्र के विद्वान डॉ. मनमोहन सिंह का 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया। गुरुवार को उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें दिल्ली स्थित एम्स के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती किया गया था, जहां डॉक्टरों ने उनके निधन की पुष्टि की। डॉ. मनमोहन सिंह के निधन से देश ने एक ऐसे नेता को खो दिया है, जो अपने शांत स्वभाव और निर्णायक सोच के लिए जाने जाते थे। पीवी नरसिम्हा राव सरकार में बतौर वित्त मंत्री रहते हुए उनके द्वारा पेश किया गया बजट, भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास और इसकी नई शुरुआत में अभूतपूर्व योगदान रखता है। आइए आज हम उनकी जिंदगी से जुड़े खास तथ्यों को जानते हैं…
पंजाब यूनिवर्सिटी से की पढ़ाई
डॉ. मनमोहन सिंह का जन्म 26 सितंबर, 1932 को ब्रिटिश भारत (मौजूदा पाकिस्तान) के पंजाब प्रांत के गाह गांव में हुआ। उनके पिता गुरमुख सिंह और माता अमृत कौर विभाजन के दौरान भारत चले आए। मनमोहन सिंह ने पंजाब यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में स्नातक और परास्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद 1957 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और 1962 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से उन्होंने उच्च शिक्षा पूरी की।
संयुक्त राष्ट्र से शुरू हुआ सफर
डॉ. सिंह का करियर 1966-69 में संयुक्त राष्ट्र के साथ शुरू हुआ। फिर दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर के रूप में काम किया। इसके बाद उन्होंने 1970-80 के दशक में भारत सरकार के प्रमुख पदों पर काम किया, जिनमें चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर, रिजर्व बैंक के गवर्नर और योजना आयोग के मुखिया जैसे पद शामिल थे।
भारतीय अर्थव्यवस्था को दी नई दिशा
मनमोहन सिंह 1991 में वित्त मंत्री बने, उस समय भारत आर्थिक संकट से जूझ रहा था। उन्होंने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) नीतियों को लागू किया, जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी। उनकी इस पहल से भारत आर्थिक संकट से उबरने में सफल हुआ।
जब सोनिया गांधी ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाया
2004 के आम चुनाव में कांग्रेस ने जीत हासिल की। हालांकि, सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद स्वीकार नहीं किया और डॉ. मनमोहन सिंह को इस पद के लिए चुना। उनका यह निर्णय एक राजनीतिक चौंकाने वाला कदम था। सोनिया गांधी की इस रणनीति ने उन्हें पार्टी के लिए भरोसेमंद नेता साबित किया।
मनमोहन सिंह के कार्यकाल में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का गहरा प्रभाव रहा। कई महत्वपूर्ण निर्णयों में उनकी भूमिका थी। मनमोहन सिंह ने खुद स्वीकार किया था कि सरकार के फैसलों में सोनिया गांधी का बड़ा दखल था।
परमाणु समझौता
2006 में मनमोहन सिंह ने अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के साथ परमाणु समझौता किया, जिसे लेकर वामपंथी दलों ने भारी विरोध किया। लेफ्ट पार्टियों के समर्थन वापसी के बाद उनकी सरकार विश्वास मत में सफल रही। इस कदम ने भारत को वैश्विक स्तर पर परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में एक नई पहचान दी।
कभी राजीव गांधी ने कहा था जोकर
राजीव गांधी के समय योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहते हुए मनमोहन सिंह को कई बार अपमान सहना पड़ा। एक बार राजीव गांधी ने सार्वजनिक रूप से उन्हें ‘जोकर’ तक कह दिया। लेकिन मनमोहन सिंह ने कभी अपनी निष्ठा और काम पर समझौता नहीं किया।
दोबारा सत्ता में आई कांग्रेस
2009 में जब UPA सरकार दोबारा सत्ता में आई, तब भी मनमोहन सिंह को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। कई बार उनके फैसलों को सोनिया गांधी ने पलट दिया। उनके दूसरे कार्यकाल में UPA सरकार के कई घोटाले उजागर हुआ। इसी साल उनका राज्यसभा सांसद का कार्यकाल खत्म हुआ था।
बराक ओबामा की किताब में मनमोहन सिंह का उल्लेख
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपनी किताब ए प्रॉमिस्ड लैंड में लिखा कि मनमोहन सिंह का चयन सोनिया गांधी की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था। हालांकि, ओबामा ने उनकी ईमानदारी और समझदारी की प्रशंसा भी की।
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