
भोपाल। दंपतियों के रिश्ते अपनत्व और विश्वास से हटकर डीएनए टेस्ट रिपोर्ट के रिजल्ट के भरोसे पर टिके हैं। फैमिली कोर्ट में पहुंच रहे मामले इसका खुलासा करते हैं। यहां पहुंच रहे शक संबंधी हर तीसरे मामले में डीएनए टेस्ट की मांग की जा रही है। बीते ढाई साल में 72 लोगों ने डीएनए टेस्ट की मांग की है। इस साल जुलाई-अगस्त माह में 5 लोग यह मांग रख चुके हैं। हालांकि, फैमिली कोर्ट में इन याचिकाओं को खारिज कर दिया जाता है, क्योंकि डीएनए टेस्ट गंभीर परिस्थितियों में ही स्वीकृत किया जा सकता है।
खास बात यह है कि अधिकतर मामलों में पतियों ने डीएनए टेस्ट की डिमांड रखी है। सिर्फ पांच फीसदी मामलों में महिलाओं ने खुद को पतिव्रता साबित करने डीएनए टेस्ट की मांग रखी। मनोवैज्ञानिक दिव्या दुबे मिश्रा कहती हैं, दंपतियों में आपस का प्रेम और विश्वास खत्म हो रहा है। यह समाज के लिए गंभीर स्थिति है।
केस-1
बिलखिरिया निवासी युवक ने बीते साल फरवरी में अपने पांच साल के बेटे के डीएनए सैंपल की जांच कराने की पेशकश की। उसने कहा- बेटे की आदतें और चेहरा उससे नहीं मिलता। शक है कि यह बच्चा उसका नहीं है। आवेदन खारिज होने के बाद उसने कहा कि वह किसी और के बच्चे को अपना उत्तराधिकारी नहीं बना सकता।
केस-2
कोहेफिजा थाना क्षेत्र में महिला को बेटियों के साथ घर से निकाल दिया गया। पत्नी ने कहा कि पति, बेटियों को अपनी संतान नहीं मानते, इसलिए खर्च नहीं उठा रहे। यह साबित हो जाएगा कि बच्चियां उनकी हैं, तो परिवार फिर जुड़ जाएगा। पति ने कहा कि उनके परिवार में पहली संतान हमेशा बेटे ही हुए हैं, दूसरा, उसे पत्नी चरित्रहीन लगती है।
डीएनए टेस्ट की गंभीर परिस्थितियां होती हैं। दुराचार के मामले, हत्या की आशंका आदि गंभीर परिस्थितियों में कोर्ट ने पुलिस को डीएनए टेस्ट की इजाजत दी है। महज चरित्र पर लांछन लगाने या अपने चरित्र की सफाई के लिए डीएनए टेस्ट रिपोर्ट को सहारा नहीं बनाया जा सकता। – मीना गुप्ता, वरिष्ठ अधिवक्ता
(इनपुट-पल्लवी वाघेला)