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रेपो रेट बढ़ने की आहट! 7 अक्टूबर को RBI के फैसले से बदल सकती है EMI, जानें क्या होगा बदलाव?

RBI MPC Meeting: भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की बैठक 5 अक्टूबर से शुरू होगी और 7 अक्टूबर को फैसला आएगा। महंगे कच्चे तेल, कमजोर मानसून और बढ़ती महंगाई के बीच रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी की संभावना है। जानिए RBI का संभावित फैसला, महंगाई का असर और EMI पर पड़ने वाली संभावित मार।
रेपो रेट बढ़ने की आहट! 7 अक्टूबर को RBI के फैसले से बदल सकती है EMI, जानें क्या होगा बदलाव?
क्या बढ़ेगा रेपो रेट? महंगाई और महंगे कच्चे तेल ने बढ़ाई RBI की टेंशन

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की तीन दिवसीय बैठक सोमवार, 5 अक्टूबर से शुरू हो रही है। इस बैठक में देश की महंगाई, कच्चे तेल की कीमतों और अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति पर चर्चा होगी। MPC के फैसलों का ऐलान 7 अक्टूबर को किया जाएगा। इस बार सबसे ज्यादा नजर रेपो रेट पर है। जानकारों के मुताबिक, RBI इस बैठक में रेपो रेट में 0.25 फीसदी यानी 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी कर सकता है। अगर ऐसा होता है तो रेपो रेट बढ़कर 5.50 फीसदी हो जाएगी। महंगे कच्चे तेल और कमजोर मानसून के कारण महंगाई का दबाव बढ़ने से ब्याज दर बढ़ाने की संभावना मजबूत हुई है।

महंगा कच्चा तेल RBI की बढ़ा रहा चिंता

अगस्त में हुई पिछली MPC बैठक के समय हालात कुछ अलग थे। उस वक्त कच्चे तेल की कीमत औसतन 91 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थी। लेकिन सितंबर की शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई। सप्लाई से जुड़ी परेशानियों के चलते 9 सितंबर को कच्चे तेल की कीमत करीब 113 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। सितंबर के अंत में ब्रेंट क्रूड करीब 103 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ। यह कीमत RBI के 85 डॉलर प्रति बैरल के अनुमान से काफी ज्यादा है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और सप्लाई में रुकावटों ने तेल की कीमतों को ऊपर धकेला है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर देश की महंगाई और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

कमजोर मानसून ने भी बढ़ाई महंगाई की चिंता

कच्चे तेल के साथ-साथ कमजोर मानसून भी RBI के लिए बड़ी चिंता बन गया है। कम बारिश का असर खेती और फसलों की पैदावार पर पड़ सकता है। इसका असर आने वाले महीनों में खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर दिखाई दे सकता है। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में खुदरा महंगाई RBI के 6 फीसदी के स्तर से ऊपर जा सकती है। केनरा बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री माधवन कुट्टी के मुताबिक, भू-राजनीतिक तनाव और महंगे कच्चे तेल के कारण महंगाई 6.2 से 6.3 फीसदी तक पहुंच सकती है। वहीं IDFC First Bank ने दिसंबर तिमाही में महंगाई 6.1 फीसदी रहने का अनुमान जताया है। बंधन AMC का भी मानना है कि इस दौरान महंगाई 6 फीसदी से ऊपर रह सकती है।

21 में से 20 अर्थशास्त्रियों ने जताई दर बढ़ने की उम्मीद

RBI के फैसले को लेकर अर्थशास्त्रियों के बीच भी राय लगभग साफ नजर आ रही है। ET के सर्वे में शामिल 21 अर्थशास्त्रियों में से 20 ने अनुमान लगाया है कि RBI इस बार रेपो रेट बढ़ा सकता है। सिर्फ एक विशेषज्ञ ने ब्याज दरों में किसी बदलाव की संभावना जताई है। अगस्त तक ज्यादातर जानकारों को उम्मीद थी कि RBI ब्याज दरों को स्थिर रखेगा। लेकिन कच्चे तेल की कीमत बढ़ने और महंगाई का दबाव बढ़ने के बाद अनुमान बदल गया है। Goldman Sachs का भी मानना है कि बदले हुए हालात में RBI ब्याज दर बढ़ाने का सिलसिला पहले शुरू कर सकता है। यानी इस बार MPC की बैठक में रेपो रेट पर बड़ा फैसला आने की संभावना काफी मजबूत है।

आखिरी बार कब बढ़ी थी रेपो रेट?

RBI ने आखिरी बार फरवरी 2023 में रेपो रेट में 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी की थी। इसके बाद रेपो रेट 6.50 फीसदी हो गई थी। लंबे समय तक दरों को ऊंचे स्तर पर रखने के बाद पिछले साल दिसंबर में इसमें 0.25 फीसदी की कटौती की गई और रेपो रेट 5.25 फीसदी पर आ गई। अब एक बार फिर ब्याज दरों में बढ़ोतरी के संकेत मिल रहे हैं। अगर RBI 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी करता है तो रेपो रेट 5.50 फीसदी हो जाएगी।

सिर्फ घरेलू महंगाई नहीं, ग्लोबल मार्केट भी दबाव में

RBI के सामने सिर्फ देश के अंदर बढ़ती महंगाई की चुनौती नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्याज दरों का बदलता रुख भी केंद्रीय बैंक के लिए अहम है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने पिछले महीने ब्याज दरों में बढ़ोतरी की थी और अक्टूबर में भी दर बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है। अमेरिका और जापान जैसे देश महंगाई को काबू में रखने के लिए ब्याज दरों को ऊंचा कर रहे हैं। अमेरिका में ब्याज दर बढ़ने से भारत और अमेरिका के 10 साल के बॉन्ड यील्ड के बीच का अंतर घटकर करीब 189 बेसिस पॉइंट्स रह गया है। यह कई दशकों के निचले स्तरों में है। भारत की 10 साल की बॉन्ड यील्ड करीब 7.21 फीसदी और अमेरिका की 5.32 फीसदी बताई गई है। यील्ड में अंतर कम होने पर विदेशी निवेशकों के लिए अमेरिकी बाजार ज्यादा आकर्षक हो सकते हैं। बंधन AMC के CIO सुयश चौधरी के मुताबिक, मजबूत डॉलर और महंगी कमोडिटी के बीच भारत को दुनिया के ब्याज दरों के रुख को ध्यान में रखना होगा।

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मजबूत GDP ग्रोथ से RBI को मिल सकती है राहत

हालांकि RBI के लिए एक राहत की बात भी है। जून तिमाही में भारत की GDP ग्रोथ 7.8 फीसदी रही, जो RBI के अनुमान से 80 बेसिस पॉइंट्स ज्यादा थी। यस बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री इंद्रनील पान के मुताबिक, भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति मजबूत है। ऐसे में अगर RBI रेपो रेट में थोड़ी बढ़ोतरी करता है तो अर्थव्यवस्था उस अतिरिक्त दबाव को संभाल सकती है। हालांकि, हर अर्थशास्त्री दर बढ़ाने के पक्ष में नहीं है। बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस का मानना है कि ब्याज दर बढ़ने से त्योहारी सीजन में लोगों के खर्च पर असर पड़ सकता है। उनके मुताबिक, कर्ज की ब्याज दरें बढ़ने में ज्यादा समय नहीं लगता, लेकिन बैंक डिपॉजिट पर ब्याज दरों में उतनी जल्दी बदलाव नहीं करते। इससे ग्राहकों पर कर्ज का बोझ बढ़ सकता है।

Dolly Wasvani
By Dolly Wasvani

डोली वासवानी | People’s Institute of Media Studies से BAMC Student। पत्रकारिता की दुनिया में नई शुरु...Read More

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