
वासिफ खान, भोपाल। जब सूरज ढलता है, शाम की परछाइयां गहराती हैं.. ठीक उसी वक्त मेले की रोशनी जगमगाने लगती हैं। उगती उस रोशनी में दो दुनिया बसती हैं। एक दुनिया, जो तमाम कौतूहल, तालियों की गूंज लिए… चारों तरफ से करती शोर से सराबोर है; ठीक उसी वक्त.. वहां एक दूसरी दुनिया भी बसती है, जिसमें एक खामोशी पसरी है। यह खामोशी मौत के कुएं के चारों तरफ मंडराती है। सबकी नजरें, थमी हुईं सांसों के साथ उस कुएं पर है, उन्हीं थमी हुई सांसों से खुद को पैवस्त करती एक और दुनिया, जिसे उन सभी तालियों की गूंज, कौतूहल और उमड़ते शोर पर खरा उतरना है। एक उम्मीद… कि यह उसका रोज का काम ही तो है और एक ना-उम्मीदी… कि क्या मालूम, आज उसका यह अजूबा आखिरी हो।
इस समय भोपाल में उत्सव मेला का चल जा रहा है। जहां रोज हजारों की तादाद में लोग इसका लुत्फ ले रहे हैं। कहीं कुछ नया खा लेने की होड़, कहीं साजो-सामान के स्टॉल, कहीं बड़े से स्विंग झूले पर जाने की बच्चों की जिद, तो किसी स्टॉल पर दोस्तों का राउंड रिंग टॉस खेलते हुए किसी चीज को जीत लेने की अथाह खुशी। मेले में घट रहीं इन सभी घटनाओं के बावजूद, जो एक चीज आपका ध्यान खींच लेने को आतुर है… वह है मौत का कुंआ।
यह कहानी है एक ऐसी लड़की की, जिसने अपनी तकदीर को मौत के कुएं के हर घुमाव में लिखा है। एक लड़की, जो अब लड़कों की तरह ही बैखौफ होकर मौत के कुएं में, जिंदगी की जद्दोजहद के लिए बुलेट चलाती है और न जाने कितने किस्सों को समेटे एक लड़की… रीता चौधरी, जो इस बार भोपाल उत्सव मेले में लोगों की चर्चाओं का केंद्र है।
मौत का कुंआ जो मेले में बच्चों से लेकर जवानों तक की सबसे बड़ी फैंटसी है। हवा में चलती बाइकें और कारें जो गुरूत्वकर्षण के नियमों को धता बताती हैं और बेखौफ लड़के, जो जान की इस बाजी को खेलते हुए भी मस्त हैं। भोपाल उत्सव मेले में मौत का यह कुआं इस मामले में अलग है। यहां भी सब कुछ है, सिवाय इसके कि मौत के कुएं में जान पर खेलने वाला यह बेखौफ खिलाड़ी, कोई लड़का नहीं… बल्कि एक जांबाज लड़की है। एक लड़की, जिसने यह काम बतौर पैशन शुरू किया था, लेकिन आज यह उसकी मजबूरी है। एक लड़की, जहां इस जोखिम भरे खेल में अमूमन पुरुषों की भागीदारी होती है, वहां इससे हटकर वो अपनी मौजूदगी दर्ज कराती है। एक लड़की, जहां मां-बाप बुढ़ापे की लाठी बनाने के लिए लड़के की ख्वाहिश रखते हैं, वहां यह अपनी बूढ़ी हो रही मां का सहारा है।
14 की उम्र से कर रही हैं यह काम
रीता चौधरी असम की रहने वाली हैं। उन्होंने 14 साल की उम्र में घर से भागकर मौत के कुएं में बाइक चलाने का काम शुरू किया था। आज वो 29 साल की हैं और उन्हें यह काम करते हुए 15 साल बीत चुके हैं। अपने परिवार में यह काम करने वाली वो पहली हैं, इससे पहले मौत के इस खेल में उनके परिवार से किसी की भागीदारी नहीं रही। वो खुले और आजाद ख्यालों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
मेले के सिलसिले में वो पूरे साल देश की ही यात्रा पर रहती हैं। जहां कोई शहर, कोई राज्य बस कुछ दिनों के लिए उनका मेहमान होता हैं। रीता ने अब तक सिर्फ भारत के मेलों में ही यह कारनामा किया है। वो हैदराबाद, असम, कोलकाता, रांची और बेंगलुरू जैसे बड़े शहरों की यादें साझा करती हैं।
समाज की प्रतिक्रियाओं को किया दरकिनार
रीता ऐसे पेशे में हैं, जिस पर समाज की प्रतिक्रिया आनी स्वाभाविक है। इस सवाल पर रीता कहती हैं, उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अपनी जिंदगी की लगाम वो अपने हाथ में रखती हैं। वो दूसरों की सोच से प्रभावित न होकर, अपनी सोच से चलना चाहती हैं। रीता को बाइक चलाने का शौक है। इसी शौक को पूरा करने के लिए वो 14 साल पहले घर से भाग गईं थीं। उन्होंने इस काम को शौक के तौर पर शुरू किया था, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें इस काम में मजा आने लगा।
रीता बताती हैं कि शौक के तौर पर शुरू किया गया यह काम, अब उनके लिए एक मजबूरी भी बन गया है। उन्हें बेखौफ होकर बाइक चलाने के अलावा कुछ नहीं आता। उन्होंने किशोरावस्था में एक पड़ोसी की मदद से बाइक चलानी सीखी था, जिसे वो अपना उस्ताद भी मानती हैं। मेले में परफॉर्मेंस के दौरान दर्शक दीर्घा में किसी मनचले द्वारा की जा रही बदतमीजी पर वो कहती हैं, दुनिया में हर कोई बुरा नहीं हैं। अगर कुछ लोग कभी इस तरह की घिनौनी हरकत करते हैं, तो हमारे काम को सराहने वाले भी बहुत से लोग हैं।
परफॉर्मेंस के दौरान हो चुका है हादसा
रीता के पिता नहीं हैं। परिवार में उनकी मां और भाई-बहन हैं। उन सभी को पालने के लिए रीता अपनी तरफ से हर कोशिश करती हैं। वह शादीशुदा हैं। परफॉर्मेंस के दौरान हुए किसी हादसे पर वो बताती हैं, ऐसा सिर्फ एक बार हुआ है। हालांकि, खास चोटें नहीं आई। यह काम ही उनकी रोजी-रोटी है। वो कहती हैं, जिस तरह रोड पर एक्सीडेंट होने पर हम सड़कों पर गाड़ियां चलाना नहीं बंद करते, ठीक उसी तरह हम इस काम को भी देखते हैं। आमदनी की बात करें, तो रीता इस काम गुजारे भर की रकम इकट्ठा कर पाती हैं।
जब बाइक चलाने की हिम्मत है, तब तक करती रहूंगी यह काम
मेले की चमकती इस दुनिया के तले एक स्याह पहलू भी है, जिससे रीता हर रोज दो-चार होती हैं। वो जद्दोजहद जिंदगी और मौत का हो, परिवार का हो, आमदनी का हो, समाज की नजरों का हो। वो कब तक इस काम को करती रहेंगी, इस आखिरी सवाल पर वो कहती हैं… जब तक बाइक चलाने की हिम्मत बरकरार है, तब तक इस काम को करने का हौसला भी बरकरार रहेगा।
हर आवाज के पीछे छुपी होती है एक कहानी। कभी ये कहानियां भूख की होती हैं, कभी मजबूरी की, कभी उन सपनों की, जो अधूरे रह गए और पीछे छूटते हुए मरिचिका बन गए। यह मौत का कुआं रीता का आश्रय है, जिनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है।
रीता जानती है, ये खेल सिर्फ रोमांच का नहीं है। यहां हर चक्कर, हर मोड़ उनकी जिंदगी और मौत का इम्तिहान है। लेकिन इसी कुएं में उन्हें अपनी आजादी और जीने का हौसला भी मिला है। अब यह उनकी मजबूरी के साथ ही, उसका जुनून भी है। रीता हर रात अपनी बाइक पर चढ़ती है, मौत के कुएं में उतरती है और हर बार वापस आती हैं।
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