
वाराणसी। “मसान की होली” उत्तर भारत के कुछ विशेष क्षेत्रों में मनाई जाने वाली एक अनूठी परंपरा है, जो आमतौर पर वाराणसी (बनारस) में देखी जाती है। जलती चिताएं, रोते-बिलखते लोग, डीजे की तेज आवाज और चिता की राख से खेली जाने वाली होली—यह दृश्य है वाराणसी के मणिकर्णिका घाट का, जहां हर साल पारंपरिक रूप से मसाने की होली खेली जाती है। इस अनूठे रंगोत्सव की शुरुआत डमरू वादन से हुई।
मसान की होली का अनोखा नजारा
घाट पर भक्तगण और साधु-संत अलग-अलग रूप में उत्सव में शामिल हुए। कोई गले में नरमुंडों की माला पहनकर तांडव कर रहा था, तो कोई डमरू की थाप पर नृत्य कर रहा था। नागा संन्यासियों ने अपने परंपरागत अंदाज में तलवारें और त्रिशूल लहराए।
इस बीच, घाट पर चिताएं जलती रहीं और शवयात्राएं भी गुजरती रहीं, लेकिन श्रद्धालुओं का जोश कम नहीं हुआ। घाट पर इतनी भीड़ उमड़ी कि पैर रखने तक की जगह नहीं बची। सड़कों पर राख की परत बिछ गई और हर कोई इस अलौकिक वातावरण में डूबा नजर आया।
मसान की होली क्या है?
वाराणसी में महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर विशेष रूप से “मसान की होली” खेली जाती है। इसे बाबा महाकाल (शिव) की भक्ति से जोड़ा जाता है, क्योंकि काशी को मृत्यु और मोक्ष का नगर माना जाता है। यहां यह मान्यता है कि शिव स्वयं भस्म (राख) रमाने वाले हैं, इसलिए भक्त उनके रंग में रंगकर इस अनोखी होली को खेलते हैं।
कैसे मनाई जाती है मसान की होली?
- भस्म की होली : रंगों के स्थान पर चिता की भस्म (राख) से होली खेली जाती है।
- अघोरी संप्रदाय का जुड़ाव : कई साधु और अघोरी इस अनूठी होली का हिस्सा बनते हैं, जो शिव को समर्पित अपनी साधना में लीन रहते हैं।
- मंत्रोच्चार और तांडव : होली के दौरान शिव तांडव स्तोत्र का पाठ किया जाता है और शिव भक्त नृत्य करते हैं।
- आस्था और मोक्ष की अवधारणा : यह मान्यता है कि जो इस होली में शामिल होता है, उसे जीवन-मृत्यु के बंधन से मुक्ति मिलती है।
काशी की मसान होली
- मसान (श्मशान) होली रंगभरी एकादशी के अलगे दिन मनाई जाती है। काशी में रंगभरी एकादशी के दिन से होली उत्सव का आरंभ हो जाता है।
- रंगभरी एकादशी से अगले 6 दिनों तक होली खेली जाती है।
- इस साल काशी में 11 मार्च, मंगलवार यानी आज मसान होली मनाई जाएगी।
- माना जाता है कि मसान होली के दिन काशी के हरिश्चंद्र और मर्णिकर्णिका घाट पर भगवान शिव अपने गणों के साथ होली खेलते हैं।
क्यों मनाई जाती है मसान होली
- माना जाता है कि भगवान शिव रंगभरी एकादशी के दिन देवी गौरी का गौना कराकर उनके साथ काशी पहुंचे थे।
- काशी में गणों ने उनका स्वागत गुलाल-अबीर के साथ होली खेलकर स्वागत किया था।
- कहा जाता है कि भगवान शिव भूत-प्रेत, यक्ष, गंधर्व और प्रेत आदि के साथ होली नहीं खेल पाए और अगले दिन उन्होंने होली खेली।
- यहीं से काशी में मसान होली मनाने की परंपरा शुरू हुई।
इसका महत्व
“मसान की होली” सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं बल्कि जीवन और मृत्यु के चक्र को समझने और उसे शिव की भक्ति में समर्पित करने की एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है। यह हमें बताती है कि मृत्यु एक अंत नहीं, बल्कि मोक्ष का द्वार है, और शिव के सान्निध्य में इसे प्रसन्नता से स्वीकार किया जाता है।