कभी बांटते थे अखबार, पायलट बनने का सपना टूटा, फिर भी नहीं मानी हार...ऐसे बने भारत के मिसाइल मैन!

नई दिल्ली। भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की जयंती पर उनकी जिंदगी का वह किस्सा फिर याद आता है, जब एक अधूरा सपना उनके लिए नई राह की शुरुआत बना। बचपन में परिवार की मदद के लिए अखबार बांटने वाले कलाम ने पढ़ाई के दम पर विज्ञान की दुनिया में अपनी पहचान बनाई। उनका सपना भारतीय वायुसेना में पायलट बनना था, लेकिन चयन प्रक्रिया में वह सफल नहीं हो सके। इस नाकामी से निराश होने के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी। आगे चलकर उन्होंने मिसाइल और अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में अहम योगदान दिया और देश के 11वें राष्ट्रपति बने।
रामेश्वरम से शुरू हुआ मेहनत का सफर
डॉ. कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में हुआ था। उनके पिता जैनुलाब्दीन नाव चलाने का काम करते थे और मां आशियम्मा घर संभालती थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति साधारण थी। बचपन में कलाम अखबार बांटकर घर की मदद करते थे। पढ़ाई के साथ जिम्मेदारियां निभाने की इस आदत ने उन्हें अनुशासन और मेहनत का महत्व सिखाया।
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पायलट बनने का सपना क्यों रह गया अधूरा?
कलाम को बचपन से उड़ते विमानों में दिलचस्पी थी। इसी कारण उन्होंने विमान से जुड़ी तकनीक की पढ़ाई की और भारतीय वायुसेना में पायलट बनने का प्रयास किया। देहरादून में चयन प्रक्रिया के बाद वह आठ उपलब्ध स्थानों के मुकाबले नौवें स्थान पर रहे। इस वजह से उनका चयन नहीं हो सका। यह उनके लिए बड़ा झटका था, लेकिन उन्होंने इसे अपनी जिंदगी की आखिरी हार नहीं माना।
असफलता के बाद चुनी नई राह
पायलट बनने में नाकाम रहने के बाद कलाम ने अपने भविष्य पर दोबारा विचार किया। वह ऋषिकेश भी गए, जहां स्वामी शिवानंद से मुलाकात के बाद उन्हें निराशा से उबरने की प्रेरणा मिली। इसके बाद उन्होंने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अपना काम आगे बढ़ाया। उनका जीवन बताता है कि मनचाहा परिणाम न मिलने पर भी नए अवसर तलाशे जा सकते हैं।
मिसाइल और अंतरिक्ष कार्यक्रम में बड़ा योगदान
कलाम ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) में काम किया। वह भारत के एसएलवी-3 उपग्रह प्रक्षेपण यान के विकास से जुड़े रहे। वर्ष 1980 में रोहिणी उपग्रह को कक्षा में स्थापित करने की सफलता ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को मजबूती दी। बाद में अग्नि और पृथ्वी जैसी मिसाइलों के विकास में उनकी अहम भूमिका रही। इसी योगदान के कारण उन्हें मिसाइल मैन कहा गया।
वैज्ञानिक से बने देश के राष्ट्रपति
25 जुलाई 2002 को डॉ. कलाम ने भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में पद संभाला। उनका कार्यकाल 2007 तक रहा। राष्ट्रपति भवन में रहते हुए भी उन्होंने विद्यार्थियों से जुड़ाव बनाए रखा। वह युवाओं को बड़े सपने देखने, विज्ञान सीखने और देश के विकास में योगदान देने के लिए प्रेरित करते थे। इसी वजह से लोग उन्हें जनता का राष्ट्रपति भी कहते थे।
युवाओं के लिए आज भी प्रेरणा हैं कलाम
डॉ. कलाम की आत्मकथा Wings of Fire उनके संघर्ष और सफलता की कहानी बताती है। 27 जुलाई 2015 को शिलांग में विद्यार्थियों को व्याख्यान देते समय उनकी तबीयत बिगड़ी और उनका निधन हो गया। वह 83 वर्ष के थे। उनकी जिंदगी का संदेश आज भी साफ है—एक सपना पूरा न हो, तो मेहनत करना बंद नहीं करना चाहिए। नई दिशा चुनकर भी बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है।




















