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अनोखी परंपरा : भारत के इस गांव में रंगों से नहीं जलते अंगारों से खेली जाती है होली, जानें इसके पीछे की कहानी…

होली पूरे भारत में अलग-अलग तरह से मनाई जाती है। कहीं रंगों की होली होती है, तो कहीं लट्ठमार और लड्डू मार होली का आयोजन होता है। लेकिन, गोवा के मोल्कोर्नेम गांव में होली का त्योहार बहुत ही अनोखे तरीके से मनाया जाता है। यहां लोग जलते हुए अंगारे खुद पर बरसाते हैं और इस परंपरा को ‘शेनी उजो’ कहा जाता है।

क्या है ‘शेनी उजो’?

‘शेनी उजो’ कोंकणी भाषा का शब्द है, जिसमें ‘शेनी’ का मतलब उपला (गोबर के कंडे) और ‘उजो’ का मतलब आग होता है। इस अनोखी परंपरा में लोग खुद को जलते हुए उपलों से बने अंगारों से झुलसाते हैं। यह परंपरा होली की पूर्व संध्या पर निभाई जाती है।

कब और कैसे होती है इसकी तैयारी?

गांव के निवासी कुशता गांवकर के अनुसार, इस परंपरा की तैयारी होली से करीब 15 दिन पहले शुरू हो जाती है। इस दौरान अनुष्ठान में शामिल होने वाले लोग सिर्फ शाकाहारी भोजन करते हैं और सात्विक जीवन अपनाते हैं।

कैसे मनाया जाता है यह अनुष्ठान?

  • होली की पूर्व संध्या पर गांव के सैकड़ों लोग श्री मल्लिकार्जुन, श्री वागरोदेव और श्री झालमीदेव मंदिर के पास एकत्रित होते हैं।
  • अनुष्ठान में हिस्सा लेने वाले नंगे पांव दौड़ते हैं और पूरी रात यह आयोजन चलता है।
  • सुबह होते ही उपलों को जलाकर अंगारे ऊपर उछाले जाते हैं, जो लोगों के शरीर पर गिरते हैं।
  • अनुष्ठान में भाग लेने वाले लोग जलते अंगारों के नीचे से दौड़कर निकलते हैं।

शिवलिंगों से जुड़ी मान्यता

मोल्कोर्नेम गांव के आसपास 43 शिवलिंग स्थित हैं, इसलिए यह अनुष्ठान शिव भक्ति से जुड़ा हुआ माना जाता है। गांव के लोगों का मानना है कि यह परंपरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है और देवताओं की कृपा पाने का एक तरीका है।

कई सालों से निभाई जा रही परंपरा

हालांकि, किसी को यह नहीं पता कि यह परंपरा कब से चली आ रही है, लेकिन यह गांव की संस्कृति का अहम हिस्सा बन चुकी है। गांव के लोग इसे आस्था और भक्ति का प्रतीक मानते हैं और हर साल इस परंपरा को निभाते हैं।

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