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चुनावी वर्ष में किसानों को रिझाने गोबर-गोमूत्र खरीदने की योजना बना रही मध्यप्रदेश सरकार

मुख्यमंत्री चौहान ने अधिकारियों को छग की तर्ज पर गोबर-धन योजना बनाने के दिए निर्देश

राजीव सोनी, भोपाल। लाड़ली बहना योजना की लॉन्चिंग के बाद चुनावी वर्ष में मध्यप्रदेश सरकार अब किसानों को रिझाने जल्दी ही छत्तीसगढ़ की तर्ज पर गोबर और गो-मूत्र खरीदने की योजना बना रही है। गोबर-धन प्रोजेक्ट के जरिए  सरकार एक साथ कई लक्ष्य साधने की कोशिश में है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसे अपना महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट बताते हुए हाल ही में अपने अधिकारियों को पूरा प्लान बनाने के निर्देश दिए हैं। विधानसभा चुनाव के पहले यह योजना लॉन्च करने की तैयारी है। इसके लिए प्रदेश में मौजूद गो-वंश की संख्या के हिसाब से किस भाव में और कितना गोबर और गो-मूत्र खरीदा जाएगा, इसका आकलन करने को कहा गया है। सरकार का मानना है कि गोबर-धन योजना लागू होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार के साथ गौ-पालन के लिए लोग प्रेरित होंगे। शहरों और सड़कों में घूमने वाले आवारा मवेशी घटेंगे और ऑर्गेनिक खेती को भी बढ़ावा मिलेगा।

छग, गुजरात का होगा अध्ययन

पचमढ़ी में पिछले साल मंत्रिमंडल की चिंतन बैठक में मुख्यमंत्री चौहान ने  पहली बार इस मुद्दे पर चर्चा कर प्रोजेक्ट की खूबियां गिनाई थीं। लेकिन इसके बाद मामला आगे नहीं बढ़ा। अब एकाएक मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को पूरी योजना बनाकर लाने को कहा है। इसके लिए छत्तीसगढ़ में गोबर-गो-मूत्र खरीदी के साथ ही गुजरात ‍सहित अन्य राज्यों में गौ-संरक्षण के नवाचारों का अध्ययन भी किया जाएगा। शहरों और ग्रामीण अंचलों में गोबर-गो-मूत्र खरीदी केंद्र आदि के बारे में विस्तृत प्रोजेक्ट बनाने के निर्देश दिए गए हैं। सरकार का मानना है कि इस योजना से गौ-संरक्षण, गौ-पालकों की आमदनी बढ़ोतरी के साथ गौ-शालाओं को आत्मनिर्भर बनाने में मदद मिलेगी। मध्यप्रदेश में अभी भोपाल, इंदौर, जबलपुर, सागर सहित कई शहरों में व्यवसायिक स्तर पर गौ-काष्ठ निर्माण में गोबर का उपयोग हो रहा है। राजधानी सहित प्रदेश के कई शहरों में अंतिम संस्कार में गौ-काष्ठ का उपयोग बढ़ गया है।

आचार्य विद्यासागरजी ने शुरू कराए प्रयोग

सागर जिले के देवरीकलां के पास जैन संत आचार्य विद्यासागर जी ने शांतिधारा में गो-मूत्र और गोबर के उपयोग से कई सफल प्रयोगों पर काम शुरू कराया है। यहां ईंधन गैस से लेकर मोटर पंप और रोशनी के लिए जेनरेटर भी संचालित हो रहे हैं। कृषि विभाग के कई बड़े अधिकारी शांतिधारा का यह प्रोजेक्ट देखकर तारीफ भी कर चुके हैं। इससे बिजली और ईंधन की बचत भी होने लगी है।

ऐसे बन रहा कीटनाशक

ऑर्गेनिक खेती में गोबर-गो-मूत्र का घोल असरकारक कीटनाशक का काम कर रहा है। कृषि वैज्ञानिक इसकी तारीफ कर रहे हैं।  यह घोल बनाने के लिए 10 लीटर गो-मूत्र, 10 किलोग्राम गोबर, 1किलो बेसन, 2 किलो गुड़ को 100 लीटर पानी में मिलाकर कुछ दिन बंद करके रख देते हैं। कुछ ही दिनों में तैयार यह घोल बढि़या कीटनाशक का काम कर रहा है।

छग में 26 फीसदी बढ़े गोपालक

उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ में यह प्रयोग सफल हो चुका है। वहां ग्रामीणों की आय बढ़ने के साथ ही इस योजना की सफलता से गोपालकों की संख्‍या में 26 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। छग सरकार खरीदी केंद्रों पर अब 4 रुपए प्रति लीटर गो-मूत्र और 5 रुपए प्रति किलो गोबर खरीदने लगी है। पहले वहां गोबर 2 रुपए प्रति किलो खरीदा जा रहा था। छग में गोबर से अगरबत्ती, दीपक, हवन सामग्री, उपले और कलर पेंट भी बनने लगा है। गो-मूत्र से दवाएं और अर्क बन रहा है।

इंदौर के प्रयोग की चर्चा

पचमढ़ी बैठक में सीएम ने इंदौर के प्रयोग का जिक्र किया था। गोबर-धन योजना से पीएनजी संयंत्र के  सफल संचालन का प्रयोग इंदौर सहित अन्य स्थानों में हो चुके हैं। अब इन्हें प्रदेश के शहरी-ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाने की जरूरत है। गौ-काष्ठ के अलावा बड़े पैमाने पर वर्मी कम्पोस्ट खाद भी गोबर-गो-मूत्र से बनाया जा रहा है। यह खाद महंगी कीमत पर बिकने लगा है।

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