
संजय कुमार तिवारी-जबलपुर। परंपरा का अनूठा खेल गोटमार मप्र के पांढुर्णा जिले में सदियों से चला आ रहा है। यह भादो मास के कृष्ण पक्ष में अमावस्या के दूसरे दिन आयोजित किया जाता है। इस बार तीन सितंबर को यह आयोजन है। मराठी भाषा में गोटमार का अर्थ पत्थर मारना होता है। शब्द के अनुरूप मेले के दौरान पांढुर्णा और सावरगांव के बीच बहने वाली जाम नदी के दोनों ओर बड़ी संख्या में लोग एकत्र होते हैं और सूर्य उदय होते ही पलाश के पेड़ की डगाल को झंडा स्वरूप जाम नदी के बीचों बीच गाड़ देते हैं और सुबह लगभग 9 बजे से सूर्यास्त तक पत्थर मारकर एक-दूसरे का लहू बहाते हैं। इस घटना में कई लोग घायल हो जाते हैं। 1955 से लेकर अब तक 14 की मौत हो चुकी और हजारों घायल हो चुके हैं। कई की आंख फूट चुकी है। हर साल 300 से 400 लोग घायल होते हैं।
जिला प्रशासन ने मानी ग्रामीणों के सामने हार
पांढुर्णा कलेक्टर अजय देव शर्मा ने बताया कि स्थानीय लोगों से चर्चा की गई थी कि इसका स्वरूप बदला जाए, लेकिन लोगों का मानना है कि बिना पत्थर बरसाए इस मेले का आयोजन नहीं हो सकता।
इनकी हुई मौत
- 1955 महादेवराव सांबारे
- 1978 देवराव सकरड़े
- 1979 लक्ष्मण तायवाड़े
- 1987 कोठिराम सांबारे
- 1989 विठठ्ल तायवाड़े
- 1989 योगीराज चौरे
- 1989 सुधाकर हापसे
- 1989 गोपाल चन्ने
- 2004 रवि गायकी
- 2005 जर्नादन सांबरे
- 2008 गजानन घुगुस्कर
- 2011 देवानंद वघाले