
भोपाल में रंगमंच में टिकट कल्चर की शुरुआत हो चुकी है और दर्शक इस पहल का स्वागत करते हुए टिकट के साथ नाटक देखने पहुंच भी रहे हैं। शो भले ही हाउसफुल न हो लेकिन आदर्श दर्शक संख्या नजर आने लगी है। बुधवार को एलबीटी में एकरंग संस्था द्वारा अकीरा कुरुसावा की जापानी फिल्म ‘राशोमोन’ पर आधारित नाटक ‘मटियाबुर्ज’ का मंचन किया गया। इसके एक ही दिन में दो शो हुए। इस नाटक का निर्देशन प्रोडक्शन डिजाइनर और जाने-माने निर्देशक जयंत देशमुख ने किया। फिल्म की स्क्रिप्ट का हिंदी अनुवाद रमेशचंद्र शाह ने किया। निर्देशक जयंत देशमुख ने बताया कि इस नाटक की पहली प्रस्तुति 1981 में भोपाल में ही भारत भवन में बव कारंत (बाबा) के निर्देशन में दी गई थी। वहीं भोपाल में आखिरी बार 1991 में प्रस्तुति दी गई थी।
स्टोरी से आखिर तक बंधे रहे दर्शक
जयंत देशमुख के रंगमंच में उनके प्रयोग सदैव दूसरों से हटकर रहते हैं। उन्होंने सेट भी बांसों की मदद से बनाया और बारिश के लिए साउंड का उपयोग किया। शहर के लोग अब टिकट लेकर नाटक देखने के लिए पहुंच रहे हैं, जो कि अच्छी बात है। नाटक की स्टोरी सस्पेंस से भरी रही, जिससे दर्शक आखिर तक बंधे रहे। – संदीप पाटिल, दर्शक
बांसों की मदद से तैयार किया सेट
नाटक में मुंबई में रह रहे भोपाल के कलाकार राजीव यादव, अनिल दुबे, महेंद्र रघुवंशी शामिल रहे। संगीत उमेश तरकसवार का रहा। नाटक में अभिनय के लिए मंच पर बांसों की मदद से सेट तैयार किया गया। इस नाटक का नाम ‘मटियाबुर्ज’ जगह की नाम के आधार पर रखा गया, जिसका मतलब है, मिट्टी के ढेर पर बना खंडहर, जहां लाशों को डाला जाता है। इसमें चार लोग बारिश से बचने के लिए मटियाबुर्ज में जाकर छिप जाते हैं और वहां की वस्तुओं के बारे में अपने-अपने दृष्टिकोण बताते हैं। नाटक में दिखाया गया कि हम सच उतना ही बोलते या बताते हैं, जितना हम चाहते हैं कि दुनिया उस पर यकीन करें। ऐसा अमूमन हम सभी करते हैं। – जयंत देशमुख, डायरेक्टर