
शाहजहांपुर (उप्र)। शाहजहांपुर जिले में पारंपरिक ‘लाट साहब’ होली जुलूस के मार्ग पर स्थित मस्जिदों को तिरपाल से ढक दिया गया है और रंगों के त्योहार से पहले कड़े सुरक्षा उपाय किए गए हैं। इसके अलावा इस बार होली वाले दिन जुमे (शुक्रवार) की नमाज के चलते प्रशासन कोई कमी नहीं छोड़ना चाहता है। होली और जुमे (शुक्रवार) के संयोग को ध्यान में रखते हुए विशेष इंतजाम किए गए हैं।
सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए
18वीं शताब्दी की परंपरा के अनुसार, शाहजहांपुर में होली की शुरुआत एक बैलगाड़ी पर बैठे ‘लाट साहब’ (एक ब्रिटिश लॉर्ड) का वेश धारण किए हुए एक व्यक्ति पर जूते फेंकने से होती है। स्थानीय प्रशासन द्वारा जुलूस मार्ग पर बैरिकेड लगाए गए हैं और कई सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए हैं।
मस्जिदों पर रंग न पड़े
इस बार प्रशासन ने जुलूस मार्ग पर स्थित लगभग 20 मस्जिदों को तिरपाल से ढक दिया है ताकि उन पर रंग न पड़े। साथ ही विद्युत ट्रांसफार्मरों के पास अवरोधक लगाए गए हैं ताकि कोई अप्रिय घटना न हो। नगर आयुक्त डॉ. विपिन कुमार मिश्रा ने बताया कि मार्ग पर 350 से अधिक सीसीटीवी और स्टिल कैमरे लगाए गए हैं ताकि हर गतिविधि पर नजर रखी जा सके।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम
- पुलिस अधीक्षक राजेश एस ने बताया कि शहर में कुल 18 जुलूस निकलते हैं, जिनमें से दो प्रमुख हैं। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए:
- बड़े ‘लाट साहब’ जुलूस को तीन जोन और आठ सेक्टर में बांटा गया है।
- 100 मजिस्ट्रेट, 10 पुलिस क्षेत्राधिकारी, 250 उपनिरीक्षक और 1500 से अधिक पुलिसकर्मी तैनात रहेंगे।
- पीएसी की दो कंपनियां भी जुलूस मार्ग पर सुरक्षा के लिए तैनात की गई हैं।
- 2423 लोगों पर निरोधात्मक कार्रवाई की गई है।
- राजेश एस ने कहा, “किसी को भी कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जाएगी। होली का त्योहार शांति और सद्भाव के साथ मनाएं। हंगामा करने वालों पर सख्त नजर रखी जाएगी।”
- जुलूस के आगे और पीछे दो ट्रैक्टर-ट्रॉली चलेंगी जो रास्ते में गिरे जूते-चप्पल और कचरा उठाएंगी।
- 16 पुलिस पिकेट पॉइंट पर स्टिल कैमरे लगाए गए हैं, जिनकी वीडियो ग्राफी की जाएगी और इसे लाइव देखा जा सकेगा।
लाट साहब’ जुलूस की ऐतिहासिक परंपरा
स्वामी सुकदेवानंद कॉलेज के इतिहासकार डॉ. विकास खुराना के अनुसार, यह परंपरा 1728 से चली आ रही है। नवाब अब्दुल्ला खान जब फर्रुखाबाद से लौटे, तब उन्होंने जनता के साथ होली खेली। 1930 से यह जुलूस ऊंट गाड़ी पर निकलने लगा और धीरे-धीरे इसका स्वरूप बदल गया। 1990 के दशक में इसे रोकने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर हुई, लेकिन अदालत ने इसे पुरानी परंपरा मानते हुए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
कुंचा लाला से शुरू होकर यह जुलूस फूलमती मंदिर तक जाता है। मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद जुलूस कोतवाली पहुंचता है, जहां ‘लाट साहब’ कोतवाल से पूरे साल के अपराधों का ब्योरा मांगते हैं। कोतवाल ‘रिश्वत’ के रूप में शराब की बोतल और नकद धनराशि ‘लाट साहब’ को भेंट करते हैं।