‘हर कोई पत्रकार बनने लगेगा तो…’ फ्रीलांस पत्रकारों पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, रील बनाने वालों पर भी चर्चा

सुप्रीम कोर्ट ने फ्रीलांस पत्रकारों, स्वतंत्र रिपोर्टरों और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की सुरक्षा पर अहम सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि हर नागरिक के पत्रकार बनने से मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। जानिए पत्रकारों की मान्यता, रील बनाने वालों के अधिकार, वर्किंग जर्नलिस्ट्स एक्ट और दिल्ली पुलिस की भूमिका पर सुनवाई में क्या-क्या हुआ।
‘हर कोई पत्रकार बनने लगेगा तो…’ फ्रीलांस पत्रकारों पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, रील बनाने वालों पर भी चर्चा
पत्रकार या सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर, अंतर कैसे तय होगा? सुप्रीम कोर्ट ने उठाए अहम सवाल

नई दिल्ली: आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन से वीडियो बनाना और सोशल मीडिया पर खबरें साझा करना बेहद आसान हो गया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या हर व्यक्ति को पत्रकार माना जा सकता है और क्या उसे पत्रकारों जैसी अतिरिक्त सुरक्षा मिलनी चाहिए? इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अहम टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि अगर देश का हर नागरिक पत्रकार बनने लगेगा, तो इससे कई तरह की समस्याएं पैदा हो सकती हैं। अदालत स्वतंत्र पत्रकारों, फ्रीलांस रिपोर्टरों और सोशल मीडिया पर रील बनाने वालों के अधिकारों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।

फ्रीलांस पत्रकारों की सुरक्षा पर क्या है मामला?

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिकाओं में मांग की गई है कि विरोध-प्रदर्शनों और दूसरे सार्वजनिक कार्यक्रमों की रिपोर्टिंग करने वाले स्वतंत्र पत्रकारों के काम में पुलिस बेवजह रुकावट न डाले। याचिकाओं में पत्रकारों की अभिव्यक्ति की आजादी की सुरक्षा पर भी जोर दिया गया है। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कहा कि दिल्ली पुलिस विरोध-प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करने वाले फ्रीलांस और स्वतंत्र पत्रकारों को पत्रकार के रूप में मान्यता नहीं देती। उनके मुताबिक, पुलिस कई बार उनसे प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) का मान्यता पत्र दिखाने को कहती है। जयसिंह ने अदालत से कहा कि इस मामले में पूरे देश के लिए एक समान नियम बनाए जाने चाहिए। उन्होंने दलील दी कि अगर किसी पत्रकार के पास संबंधित मीडिया संस्थान का पहचान पत्र है, तो उसे अपना पेशेवर काम करने से नहीं रोका जाना चाहिए।

'हर किसी को पत्रकार मानना आसान नहीं'

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने इस मुद्दे पर सावधानी से विचार करने की जरूरत बताई। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर हर कोई पत्रकार बनने लगेगा, तो इससे दूसरे लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। न्यायमूर्ति बागची ने भी सवाल उठाया कि क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देश के हर नागरिक को पत्रकार बनने और पत्रकारों को मिलने वाली विशेष सुरक्षा पाने का अधिकार देता है। उन्होंने कहा कि इस सवाल का जवाब देना आसान नहीं है और इस पर विस्तार से विचार करना होगा। अदालत के सामने यह तय करने की चुनौती है कि पत्रकारों की अलग-अलग श्रेणियों के लिए सुरक्षा के नियम क्या होने चाहिए और किन लोगों को अतिरिक्त सुरक्षा दी जानी चाहिए।

पत्रकार, इन्फ्लुएंसर और रील बनाने वालों में क्या अंतर?

सुनवाई के दौरान अदालत ने पत्रकारों की अलग-अलग श्रेणियों पर भी ध्यान दिया। इनमें मान्यता प्राप्त पत्रकार, पंजीकृत मीडिया संस्थानों में काम करने वाले पत्रकार, फ्रीलांस रिपोर्टर और स्वतंत्र पत्रकार शामिल हैं। इसके अलावा सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और रील बनाने वाले लोग भी हैं, जो घटनाओं के वीडियो बनाकर इंटरनेट पर साझा करते हैं। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि इन सभी समूहों के काम और उन्हें मिलने वाली सुरक्षा के स्तर अलग-अलग हो सकते हैं। अदालत को यह देखना होगा कि किस श्रेणी के व्यक्ति को किस तरह की सुरक्षा दी जानी चाहिए। उन्होंने इस संदर्भ में वर्किंग जर्नलिस्ट्स एक्ट का भी उल्लेख किया। अदालत इस कानून में पत्रकारों की श्रेणियों से जुड़े प्रावधानों की जांच करेगी।

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मोबाइल से वीडियो बनाने पर सॉलिसिटर जनरल ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि डिजिटल तकनीक के दौर में मोबाइल फोन रखने वाला कोई भी व्यक्ति खुद को स्वतंत्र या फ्रीलांस पत्रकार बता सकता है। उन्होंने दलील दी कि कुछ लोग सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने और पैसे कमाने के लिए रील बनाते हैं। ऐसे में घटनाओं को एकतरफा या सनसनीखेज तरीके से पेश किए जाने की आशंका भी रहती है। इसलिए सभी लोगों को पत्रकार मानकर एक जैसी सुरक्षा देने के मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है। मेहता ने महिला पत्रकारों को परेशान नहीं किए जाने की दलील का समर्थन किया। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि महिला पत्रकारों की सुरक्षा और सम्मान के साथ महिला पुलिसकर्मियों के प्रति भी समान संवेदनशीलता बरती जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के सामने अब क्या है चुनौती?

इस मामले में अदालत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्वतंत्र पत्रकारों, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और रील बनाने वालों के अधिकारों की रक्षा किस तरह की जाए। साथ ही, पत्रकारिता के नाम पर काम करने वाले अलग-अलग समूहों के बीच अंतर तय करने के लिए कौन से मानक अपनाए जाएं। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि इस मुद्दे पर विस्तार से विचार करने के बाद ही पत्रकारों की सुरक्षा और उनके अधिकारों को लेकर कोई निष्कर्ष निकाला जा सकेगा। इस सुनवाई से यह स्पष्ट है कि डिजिटल दौर में पत्रकारिता की पहचान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पुलिस की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना अदालत के लिए एक अहम विषय है।

Dolly Wasvani
By Dolly Wasvani

डोली वासवानी | People’s Institute of Media Studies से BAMC Student। पत्रकारिता की दुनिया में नई शुरु...

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