
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों की समय-पूर्व रिहाई सुनिश्चित करने के लिए वकीलों द्वारा कोर्ट के समक्ष और याचिकाओं में भी बार-बार झूठे बयान देने पर नाराजगी जाहिर की है। कोर्ट ने कहा है कि जब इस तरह के मामले सामने आते हैं, तो ‘‘हमारा विश्वास डगमगा जाता है”। जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने अपने हालिया आदेश में अपनी पीड़ा बयां की है और कहा है कि पिछले तीन हफ्तों में उनके सामने ऐसे कई मामले आए हैं, जिनमें झूठी दलीलें दी गई हैं।
कोर्ट में रोज 80 केस लिस्ट होते हैं
बेंच ने हाल ही में अपलोड किए गए 10 सितंबर के अपने आदेश में कहा, ‘‘इस कोर्ट में बड़ी संख्या में याचिकाएं दायर की जा रही हैं, जिनमें स्थाई छूट न दिए जाने की शिकायत की गई है। पिछले तीन हफ्तों के दौरान, यह छठा या सातवां मामला है, जिसमें याचिका में स्पष्ट रूप से झूठे बयान दिए गए हैं।” बेंच ने कहा कि शीर्ष अदालत (Supreme Court) में विविध मामलों की सुनवाई के दिन प्रत्येक बेंच के समक्ष 60 से 80 मामले सूचीबद्ध होते हैं और जज के लिए कोर्ट के समक्ष सूचीबद्ध प्रत्येक मामले के प्रत्येक पृष्ठ को पढ़ना संभव नहीं होता है, हालांकि प्रत्येक मामले को बहुत ही सावधानीपूर्वक देखने का प्रयास किया जाता है। बेंच ने कहा, “हमारी प्रणाली विश्वास पर काम करती है। जब हम मामलों की सुनवाई करते हैं तो हम बार के सदस्यों पर भरोसा करते हैं, लेकिन जब हम इस तरह के मामलों का सामना करते हैं, तो हमारा विश्वास डगमगा जाता है।”
याचिका में दिए झूठे बयान
बेंच ने कहा कि ऐसे ही एक मामले से निपटने के दौरान उसे पता चला कि न केवल सजा में छूट का अनुरोध करते हुए रिट याचिका में झूठे बयान दिए गए हैं, बल्कि इस अदालत के समक्ष भी झूठी दलीलें दी गई हैं, जिसे 19 जुलाई, 2024 के आदेश में दर्ज किया गया है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के तत्कालीन एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड की ओर से जेल अधिकारियों को 15 जुलाई, 2024 को प्रेषित ईमेल में फर्जी बयान दोहराए गए हैं। बेंच ने कहा, ‘‘हालांकि वह इस तथ्यात्मक स्थिति से अवगत थे, लेकिन 19 जुलाई, 2024 को एक फर्जी बयान दिया गया कि सभी याचिकाकर्ताओं (दोषियों) की फरलो की अवधि समाप्त नहीं हुई है।”
14 साल की सजा बिना छूट के काट ली
कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया था कि चार याचिकाकर्ताओं ने एक मामले में 14 साल की सजा बिना छूट के काट ली है। जबकि मामले में दिल्ली सरकार ने हलफनामा दायर किया था कि चार में से दो कैदियों ने सजा में छूट पाने के लिए 14 साल की सजा पूरी नहीं की है। पीठ ने कहा कि याचिका में गलत बयान दिया गया कि सभी चार याचिकाकर्ताओं ने वास्तविक 14 साल की सजा काट ली है। याचिकाकर्ताओं को अलग-अलग मामलों में दोषी ठहराया गया था।
बेंच ने कहा, ‘‘यह एक उपयुक्त मामला है, जहां जुर्माना लगाया जाना चाहिए, लेकिन हम याचिकाकर्ताओं को उनके वकीलों द्वारा की गई गलतियों के लिए दंडित नहीं कर सकते।” पीठ ने कहा, “समय-पूर्व रिहाई के लिए रिट की मांग करने वाली याचिका में अपराध की प्रकृति बहुत महत्वपूर्ण विचारणीय बिंदु है।” पीठ ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह छूट के लिए उनके मामलों पर गौर करें और तदनुसार आदेश पारित करें।