लुप्त हो चुके पक्षियों के गीतों को वैज्ञानिकों ने किया पुनर्जीवित, कंप्यूटर से बनाई आवाज से लौटी भूली हुई धुन

कैनबरा। वैज्ञानिकों ने पक्षियों के उन गीतों (पक्षियों की बोलियां) को फिर प्राप्त करने का एक नया तरीका खोजा है जो उनके प्राकृतिक आवासों से लुप्त हो चुके हैं। वे कंप्यूटर द्वारा निर्मित रिकॉर्डिंग का उपयोग करके पुराने पक्षी स्वरों को पुनर्जीवित कर रहे हैं। द गार्जियन में प्रकाशित इस प्रयोग से पता चलता है कि यह तकनीक अंततः वन्यजीव संरक्षण में सहायक हो सकती है। क्योंकि, यह पक्षियों को घटती आबादी के कारण लुप्त हो चुकी गायन परंपराओं को फिर सीखने में मदद करती है। साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित संबंधित शोध और ऑस्ट्रेलियाई राष्ट्रीय विश्वविद्यालय द्वारा साझा किए गए निष्कर्ष भी लुप्तप्राय प्रजातियों के लिए पक्षी गीतों के संरक्षण के महत्व को उजागर करते हैं। यह दृष्टिकोण संरक्षणवादियों के लिए एक नया उपकरण प्रदान कर सकता है जो लुप्त हो चुकी पक्षी ध्वनियों को पुनर्स्थापित करना चाहते हैं। वे पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक प्रथाओं को संरक्षित करना चाहते हैं और लुप्तप्राय पक्षी आबादी की रक्षा के प्रयासों को मजबूत करना चाहते हैं।
एक भूली हुई धुन पेड़ों पर लौटी
यह प्रयोग अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स में हुआ जहां शोधकर्ताओं ने स्थानीय लाल-कॉलर गौरैयों के बीच सुने जाने वाले एक गीत को फिर निर्मित किया। मूल गीत को 1960 के दशक में हस्तलिखित संगीतमय टिप्पणियों के माध्यम से प्रलेखित किया गया था। उसमें पक्षियों की स्वरों की संरचना को दर्शाया गया था। पिछले कुछ दशकों में इनमें से कुछ विशिष्ट गीत शैली स्थानीय आबादी से लुप्त हो गईं। शोधकर्ताओं ने ऐतिहासिक अभिलेखों का उपयोग करके लुप्त हो चुकी एक शैली का कम्प्यूटरीकृत संस्करण तैयार किया और उसे पक्षियों के प्राकृतिक आवास में बजाया।
पक्षियों ने फिर सीख लिया
तीन महीने से भी कम समय में उस क्षेत्र की एक गौरैया ने पुनर्निर्मित गीत को अपने गायन (अपनी आवाज) में शामिल करना शुरू कर दिया। यह खोज एक दिलचस्प संकेत देती है कि रिकॉर्डिंग पक्षियों के गीत के लुप्त हो चुके तत्वों को पुनः स्थापित कर सकती है। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यह व्यवहार पीढ़ियों तक बना रहेगा या नहीं। यह अध्ययन वन्यजीवों की घटती आबादी के एक कम दिखाई देने वाले परिणाम की ओर भी ध्यान आकर्षित करता है।
अस्तित्व के लिए पक्षियों के गीत का महत्व
कई गीत गाने वाले पक्षियों के लिए गाना एक सीखा हुआ कौशल है, न कि पूरी तरह से सहज व्यवहार। युवा पक्षी अपने पिता और पड़ोसी पक्षियों सहित वयस्कों को सुनकर मुखर पैटर्न सीखते हैं। समय के साथ ये साझा ध्वनियां क्षेत्रीय विविधताओं में विकसित होती हैं। इन्हें अक्सर पक्षियों की बोलियां कहा जाता है। आबादी में गिरावट इस सीखने की प्रक्रिया को बाधित कर सकती है। जब कम अनुभवी पक्षी उपलब्ध होते हैं तो युवा पक्षी अधूरे गीत विकसित कर सकते हैं या अन्य प्रजातियों की नकल कर सकते हैं। ऐसे परिवर्तन संभावित साथियों के साथ संवाद करने और स्थापित समूहों में एकीकृत होने की उनकी क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। शोधकर्ताओं ने तेजी से यह स्वीकार किया है कि संरक्षण में आनुवंशिक विविधता के साथ-साथ इन सीखे हुए व्यवहारों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। भले ही पक्षी शारीरिक रूप से जीवित रहें। लेकिन परिचित स्वर पैटर्न का लुप्त होना सफल प्रजनन में अतिरिक्त बाधाएं उत्पन्न कर सकता है। गीत की जटिलता और निरंतरता भी किसी व्यक्ति की स्थिति के बारे में जानकारी प्रदान कर सकती है।




















