ताजा खबर

Peoples Explainer : महाराष्ट्र-झारखंड और उपचुनाव के नतीजों पर विशेषज्ञों की राय

भोपाल। महाराष्ट्र चुनाव रिजल्ट में महायुति ने एकतरफा बढ़त बनाई है। 288 विधानसभा सीटों में भाजपा गठबंधन 230 पर आगे है। वहां महायुति के सरकार बनने की सारी सूरतें साफ हो गई हैं। वहीं, दूसरी ओर झारखंड में इंडिया गठबंधन 81 में से 56 सीटें अपनी झोली में डालती दिख रही है। इसके साथ ही, मध्य प्रदेश में दो विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव ने भी चौंकाया है। राजनीतिक इतिहास में औसतन, मध्य प्रदेश बीजेपी का गढ़ माना जाता रहा है। पिछले दशकों में एमपी ने चुनाव परिणामों से इसे साबित भी किया है। हालिया लोकसभा चुनाव इसका ताजातरीन मिसाल है। वर्तमान में देश भर में हो रहे चुनाव के नतीजों ने चौंकाया जरूर है। ऐसे में इसके पीछे क्या खास वजहें रहीं, जिन्होंने जनता और राजनीतिक विशेषज्ञों के पूर्वाग्रहों को तोड़ा है। पीपुल्स समाचार के स्टेट हेड मनीष दीक्षित ने इन चुनाव नतीजों पर विश्लेषण करते हुए बताया…

मनीष दीक्षित, स्टेट हेड (पीपुल्स समाचार)।

महाराष्ट्र चुनाव में सबसे अधिक आश्चर्य महायुति में भाजपा घटक दल की 149 में लगभग 133 सीटों पर अभूतपूर्व जीत दर्ज करना है। इतिहास में झांकें तो राज्य चुनाव में ऐसी स्थिति नहीं बनी है। जहां एक पार्टी 149 सीटों पर चुनाव लड़े और 133 सीटें जीत ले। जीत का यह अनुपात तकरीबन 90 प्रतिशत है। ऐसी स्थिति वर्तमान पॉलिटिक्स में मुश्किल नजर आती थी। इसके साथ ही महाराष्ट्र की जनता ने यह साबित कर दिया कि वह शिवसेना की मूलभूत विचारधारा के साथ है। वह उस विचारधारा के वाहक को ही चुनेगी। महाराष्ट्र में चला मराठा आंदोलन, जिसे फड़नवीस और कंपनी ने अच्छे से भुनाया। हालांकि, विपक्ष ने चल रहे इस मराठा आंदोलन को, जिसमें महाराष्ट्र में क्षेत्रीय लोगों को प्राथमिकता देने की बात कही जाती है, उसे मुद्दा बनाने की कोशिश की और उन्हें लगा यह ठीक से काम करेगा। लेकिन इसके परिणाम का अंदाजा लगाने में विपक्ष विफल रहा। महाराष्ट्र के लोगों ने मराठा आंदोलन को अपना धरोहर समझा। विपक्ष ने जिस तरह से अडानी के धारावी प्रोजेक्ट को मुद्दा बनाया, वह भी धराशायी साबित हुआ। इस मुद्दे को हथियार बनाकर लड़ने के लिए विपक्ष के पास सुनहरा मौका था, लेकिन धरातल पर उसका क्रियान्वयन ठीक से नहीं हो सका और महाराष्ट्र की जनता ने इसे आड़े हाथ नहीं लिया। विपक्ष के हाथ से यह मुद्दा भी फिसल गया।

एक तरफ जहां एकनाथ शिंदे के बेटे श्रीकांत शिंदे ने कई विधानसभा क्षेत्रों की यात्रा की, वहीं आदित्य ठाकरे खासतौर पर अपनी वर्ली सीट पर ही काबिज रहे। श्रीकांत शिंदे अभी महज 37 साल के हैं, लेकिन जिस तरह उन्होंने कई विधानसभाओं में सभाएं की और खासतौर पर युवाओं को अपने साथ जोड़ा, वह उनके राजनीतिक परिपक्वता का परिचायक है। हालांकि, आदित्य ठाकरे वर्ली सीट जीतने में कामयाब रहे। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना(मनसे) ने भी वर्ली में आदित्य के खिलाफ अपने प्रत्याशी को खड़ा किया, जिसने आदित्य के पक्ष में ही काम किया। अगर आदित्य यह चुनाव हार जाते तो यह शिवसेना(उद्धव गुट) के लिए यह बड़ी शिकस्त होती। इसके दूरगामी परिणाम हो सकते थे, ठीक वैसे ही जैसे कांग्रेस ने इसे विगत वर्षों में झेला है। महाराष्ट्र की राजनीति में जिस तरह ’विश्वासघात’ शब्द हो हाईलाइट किया गया, वह भी बेअसर रहा। खासकर पुरानी पार्टियों से निकली नई पार्टियां, जिन्होंने पार्टी के मौलिक चुनाव चिन्ह को अपने पाले में किया।

झारखंड में उत्तर की राजनीति में मौजूदा सबसे लोकप्रिय नारा ‘बटोगे, तो कटोगे’ ने वैसे काम नहीं किया जैसे पार्टी की मंशा थी। इसकी वजह है, झारखंड में मुस्लिमों के वोटों का ठीक-ठाक दखल और आदिवासियों का ऐसे नारों से जुड़ाव महसूस न करना। इसके साथ ही लोगों का प्रदेश की लोकल पार्टी के प्रति अपार विश्वास। दूसरे फेस की वोटिंग में इसका खास असर रहा।

जिस तरह से चुनाव परिणाम आए हैं, उससे अब यह भी साफ हो गया है कि एग्जिट पोल के आंकड़े विश्वासजनक नहीं रहे। यह जनता के मूड को परखने में लगातार नाकाम साबित हो रहे हैं। इंडिया गठबंधन का झारखंड में 50 से अधिक सीटें हासिल करना इसका उदाहरण है। दोनों प्रदेशों के विधानसभा चुनावों में महिलाओं की खास भागीदारी रही। वो अब अपने वोट के कीमत को समझने में सक्षम हो रही हैं। इन सबका श्रेय राज्य की सरकारों को भी जाता है, जो उनके हितों के लिए लाडली बहना जैसी योजनाओं के तहत आर्थिक सुनिश्चितता प्रदान कर रहे हैं और आधी आबादी इसे भुनाना जान गई है। ऐसी योजनाओं का जनक मध्य प्रदेश को मानें, तो इसमें कोई हर्जा नहीं। मध्य में जहां लाडली बहना योजना राष्ट्रीय पटल पर लोकप्रिय हुआ, उसी की तर्ज पर महाराष्ट्र में लाडली बहिन योजना और झारखंड में मैया सम्मान जैसी योजनाएं महिलाओं कभी हित में चलाई गईं।

मध्य प्रदेश की बात करें तो जिस बुधनी सीट से पूर्व मख्यमंत्री और वर्तमान में केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान लाखों वोट के फासले से अपनी जीत तय करते थे, वहां यह दरमियानी महज तेरह हजार वोटों की रह गई। खासकर तब, जब प्रदेश में आपकी पूर्ण बहुमत की सरकार है और प्रदेश हमेशा बीजेपी का हमसाथ रहा है। इस लिहाज से इसे बीजेपी की शिकस्त कहने में गुरेज नहीं होना चाहिए। वहीं विजयपुर उपचुनाव में कांग्रेस का साधारण प्रत्याशी के ऊपर किया गया प्रयोग सफल रहा। हालांकि, इस चुनाव में सत्यपाल सिकरवार ’नीटू’ की चर्चा भी जोरों पर है। माना जा रहा है, लोकसभा चुनाव में रामनिवास रावत ने जो नुकसान नीटू को पहुंचाया था, उसी का बदला लेने के लिए नीटू ने भी एक महीने पहले ही विजयपुर में कमान संभाल ली थी। जिसकी बदौलत, विजयपुर कांग्रेस अपना दबदबा कायम रख पाई।

संबंधित खबरें...

Back to top button