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SC का बड़ा फैसला, सदन में नोट लेकर वोट या भाषण दिया तो चलेगा केस

शीर्ष अदालत ने पलटा 26 साल पुराना अपना फैसला, सांसदों और विधायकों को कानूनी छूट देने से इंकार
SC का बड़ा फैसला, सदन में नोट लेकर वोट या भाषण दिया तो चलेगा केस

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने वोट के बदले नोट लेने के मामले में सोमवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। शीर्ष कोर्ट ने इस संबंध में 5 जजों की संविधान पीठ के 1998 वाले पीवी नरसिम्हा राव बनाम राज्य मामले में हुए फैसले को पलट दिया। सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की बेंच ने इस मामले में सुनवाई की। बेंच ने कहा कि वोट के लिए नोट लेने वालों पर केस चलना चाहिए। रिश्वतखोरी लोकतंत्र प्रणाली को नष्ट कर देती है: पीठ ने कहा कि हम उस फैसले से सहमत नहीं हैं, जिसमें सांसदों और विधायकों को सदन में भाषण देने या वोट के लिए रिश्वत लेने पर मुकदमे से छूट दी गई थी। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस जेबी पारदीवाला, जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस एएस बोपन्ना, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस पीवी संजय कुमार की पीठ ने कहा कि विधायकों द्वारा भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी भारतीय संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को नष्ट कर देती है। बता दें, पीठ ने इस मामले में सुनवाई के बाद 5 अक्टूबर 2023 को फैसला सुरक्षित रख लिया था।

7 जजों की बेंच ने फैसले में कहा- रिश्वतखोरी को संरक्षण नहीं

अगर कोई घूस लेता है तो केस बन जाता है। यह मायने नहीं रखता है कि उसने बाद में वोट दिया या फिर स्पीच दी। आरोप तभी बन जाता है, जिस वक्त सांसद या विधायक घूस स्वीकार करता है। संविधान के अंतर्गत रिश्वतखोरी को छूट हासिल नहीं है। संविधान के आर्टिकल 105 और 194 सदन के अंदर बहस और विचार-विमर्श का माहौल बनाए रखने के लिए हैं। दोनों अनुच्छेद का मकसद तब बेमानी हो जाता है, जब कोई सदस्य घूस लेकर सदन में वोट देने या खास तरीके से बोलने के लिए प्रेरित होता है। रिश्वत लेने वाला आपराधिक काम में शामिल होता है। ऐसा करना सदन में वोट देने या भाषण देने के लिए जरूरत की श्रेणी में नहीं आता है। कोर्ट ने कहा कि हमारा मानना है कि संसदीय विशेषाधिकारों के तहत रिश्वतखोरी को संरक्षण हासिल नहीं है।

 क्या था 1998 का फैसला?

अभी तक निर्वाचित जनप्रतिनिधि वोट के बदले रिश्वतखोरी करने पर आपराधिक मुकदमे से बच जाते थे। इसकी वजह 1998 में आया सुप्रीम कोर्ट का पीवी नरसिम्हा राव बनाम राज्य (1998) निर्णय था। तब पांच जजों की पीठ ने फैसले में कहा था कि संसद में एक निश्चित तरीके से वोट देने के लिए रिश्वत लेने वाले सांसदों को संविधान द्वारा संरक्षित किया जाता है।

मामले का आधार क्या था?

1991 लोस चुनाव में कांग्रेस ने जीत हासिल की थी और पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बनाए गए थे। 1993 में नरसिम्हा राव सरकार को अविश्वास मत का सामना करना पड़ा। हालांकि, सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव 14 वोटों से गिर गया। इसके बाद एक शिकायत दर्ज की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ वोट करने के लिए कुछ सांसदों को रिश्वत दी गई थी। जब मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा तो रिश्वत लेने के आरोपी सांसदों ने तर्क दिया कि उन्हें संसद में उनके द्वारा डाले गए किसी भी वोट और ऐसे वोट डालने से जुड़े किसी भी कार्य के लिए संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत छूट प्राप्त थी। न्यायालय इन तर्कों से सहमत हुआ और अप्रैल 1998 में तीन-दो के बहुमत से फैसला सुनाया।

दोबारा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला?

2012 में जेएमएम विधायक सीता सोरेन पर रास चुनाव में वोट देने के लिए रिश्वत लेने का आरोप लगा और केस दर्ज हुआ। सीता सोरेन झारखंड हाईकोर्ट पहुंचीं, लेकिन उनकी याचिका खारिज हो गई। फैसले के खिलाफ सीता सुप्रीम कोर्ट में पहुंची। वहां बेंच ने मार्च 2019 में मामले को पांच जजों की बेंच को भेज दिया। सितंबर 2023 को बेंच ने बताया कि हाईकोर्ट का फैसला और सीता सोरेन का बचाव नरसिम्हा राव वाले मामले पर निर्भर थे। बेंच ने मामला 7 जजों की पीठ को भेज दिया।

स्वागतम। सुप्रीम कोर्ट का एक बड़ा फैसला, जो स्वच्छ राजनीति तय करेगा और व्यवस्था में लोगों का विश्वास गहरा करेगा। नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री 

People's Reporter
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