बाड़ी के मां हिंगलाज मंदिर की अनसुनी कथा, संत भगवान दास की तपस्या से जुड़ी है स्थापना की मान्यता

बाड़ी। विंध्याचल की तलहटी में बसा बाड़ी नगर अपनी धार्मिक आस्था और लोक परंपराओं के लिए जाना जाता है। यहां स्थित मां हिंगलाज का मंदिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र है। लोकमान्यता के अनुसार, पाकिस्तान के बलूचिस्तान स्थित प्रसिद्ध हिंगलाज धाम के बाद बाड़ी में माता का विशेष दरबार है। नवरात्रि के नौ दिनों में मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। सुबह करीब 4 बजे से ही भक्त माता को जल अर्पित करने और दर्शन करने के लिए आने लगते हैं। चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान यहां विशेष पूजा-अर्चना, हवन और शतचंडी महायज्ञ का आयोजन किया जाता है।
संत भगवान दास की तपस्या से जुड़ी है मंदिर की कथा
बाड़ी के मां हिंगलाज मंदिर की स्थापना की लोककथा संत भगवान दास जी महाराज की तपस्या से जुड़ी है। प्रचलित कथा के अनुसार, संत भगवान दास रामजानकी खाकी अखाड़ा मंदिर की गादी पर विराजमान थे। वे भगवान श्रीराम के परम भक्त होने के साथ शक्ति उपासना में भी विश्वास रखते थे। जनकल्याण की भावना से वे जंगल की ओर चले गए और धूनी रमाकर मां हिंगलाज की आराधना में लीन हो गए। लोकमान्यता है कि उनकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर माता ने अबोध बालिका के रूप में दर्शन दिए।
कथा के अनुसार, माता ने संत से वरदान मांगने को कहा, लेकिन उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं मांगा और जनकल्याण का आशीर्वाद चाहा। मान्यता है कि इसके बाद मां ने भूमि से कंडी उठाकर उसमें अग्नि प्रकट की और उसी स्थान पर अपने स्वरूप की स्थापना कर पूजा करने का निर्देश दिया। बताया जाता है कि संत माता की प्रतिमा को हाथी गेट के भीतर स्थापित करना चाहते थे, लेकिन कंडी गेट के बाहर गिर गई। इसके बाद उसी स्थान पर मां हिंगलाज की प्रतिमा स्थापित किए जाने की मान्यता है।
एक फूल चढ़ाने से पूरी होती है मनोकामना!
मां हिंगलाज के दरबार में फूल अर्पित करने की परंपरा का विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि सच्चे मन से माता को फूल चढ़ाने पर मनोकामना पूरी होती है। अविवाहित कन्याएं अच्छे जीवनसाथी की कामना लेकर माता के दरबार में पहुंचती हैं। वहीं, संतान प्राप्ति की कामना से महिलाएं मंदिर में उल्टा थापा लगाती हैं। मनोकामना पूरी होने के बाद सीधा थापा लगाकर माता के प्रति आभार व्यक्त करने की परंपरा भी प्रचलित है। मंदिर से जुड़ी लोकमान्यताओं में माता के भक्त आल्हा के आगमन का उल्लेख भी मिलता है। यही मान्यताएं इस मंदिर को श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र बनाती हैं।
नोट: मंदिर की स्थापना और चमत्कारों से जुड़ी बातें स्थानीय लोकमान्यताओं पर आधारित हैं।




















