दादा शुरुआत में दाएं हाथ के बल्लेबाज थे, लेकिन उन्होंने भाई की किट इस्तेमाल करने के लिए बाएं हाथ से बल्लेबाजी सीखी। यही अनोखा फैसला आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गया।

गांगुली की मां नहीं चाहती थीं कि दादा क्रिकेट खेलें, लेकिन बड़े भाई स्नेहाशीष ने उनका साथ दिया। पिता को मनाया, कोचिंग दिलाई और वहीं से शुरू हुई क्रिकेट की कहानी।

'प्रिंस ऑफ कोलकाता' इसकी वजह सिर्फ उनका कोलकाता से होना नहीं है, बल्कि उनकी शाही बल्लेबाजी, बेखौफ कप्तानी और शहर के लोगों के बीच उनकी जबरदस्त लोकप्रियता है।

साल 2001 में दादा ने टॉस के लिए स्टीव वॉ को इंतजार करवाया, वजह था खोया हुआ ब्लेजर। वॉ तिलमिला उठे, लेकिन ईडन गार्डन्स में आखिरकार जीत की मुस्कान भारत की ही बनी।

2002 नेटवेस्ट फाइनल जीतने के बाद सौरव गांगुली ने लॉर्ड्स की बालकनी में जर्सी लहराकर पूरी दुनिया को चौंका दिया। दिलचस्प बात यह है कि यह जश्न बिल्कुल भी पहले से प्लान नहीं था।

सौरव गांगुली का परिवार भी खूब चर्चित है। उनकी पत्नी डोना गांगुली मशहूर ओडिसी नृत्यांगना हैं, वहीं उनकी बेटी सना गांगुली विदेश में पढ़ाई और करियर बना रही हैं।