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दिवाली पर जहां देशभर में मां लक्ष्मी की पूजा होती है, कार्तिक अमावस्या की रात यहां काली पूजा यानी श्यामा पूजा की खास धूम रहती है। मान्यता है कि मां काली बुराई का नाश कर भक्तों को शक्ति, सुरक्षा और निडरता देती हैं।
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मां काली को शक्ति का उग्र और रक्षक स्वरूप माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, उन्होंने राक्षसों का संहार करके संसार को उनके अत्याचारों से बचाया था।
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मां काली से जुड़ी सबसे चर्चित कथाओं में रक्तबीज का प्रसंग शामिल है। पौराणिक कथा के मुताबिक, रक्तबीज के खून की हर बूंद से नया राक्षस पैदा होता था। तब मां काली ने उसका रक्त जमीन पर गिरने से रोककर उसका अंत किया। यह बुराई पर शक्ति की जीत का प्रतीक बना।
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बंगाल में काली पूजा को 18वीं सदी में राजा कृष्णचंद्र राय ने बढ़ावा दिया। फिर जमींदारों और स्थानीय परिवारों ने इसे अपनाया, जिससे यह परंपरा धीरे-धीरे सभी बड़े त्योहारों में शामिल हो गई।
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मां काली की पूजा शाक्त और तांत्रिक परंपराओं से जुड़ी है, जहां देवी को सर्वोच्च शक्ति माना जाता है। कुछ साधनाएं श्मशान में होती हैं, लेकिन ये विशेष परंपराएं हैं, दिवाली की सामान्य पूजा का हिस्सा नहीं।
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