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जानवरों के बिहेवियर के आधार पर ट्रेन दुर्घटनाएं रोकने चल रही स्टडी

पीपुल्स समाचार के सवाल पर मध्य डीजी ने दी जानकारी

पुष्पेंद्र सिंह-लखनऊ। मध्य प्रदेश सहित देश के अन्य विभिन्न भागों में टाइगर और दूसरे जानवरों की ट्रेन से कटकर होने वाली मौतों को लेकर एक नई स्टडी की जा रही है। यह स्टडी आईआईटी रुड़की के सहयोग से चल रही है। इस स्टडी के बाद जल्द ही कोई समाधान सामने आएंगे। ये जानकारी उदय बोरवणकर, महानिदेशक, आरडीएसओ ने लखनऊ में पत्रकारों के साथ मुलाकात करते हुए दी है।

पीपुल्स समाचार के सवाल पर उन्होंने बताया कि फॉरेस्ट डिपार्टमेंट द्वारा फेंसिंग करना ही एक समाधान नहीं है, लेकिन हम आईआईटी रुड़की के साथ एक स्टडी कर रहे हैं, जिससे इंजन पर एक विशेष प्रकार से हॉर्न स्थापित होगा और यह हॉर्न जानवर के बिहेवियर को देखते हुए बजेगा। उन्होंने कहा कि अगर कोई हाथी पटरी पर आता है तो रेल चालक को एहसास नहीं होता, लेकिन दूसरे हाथी को 1 किलोमीटर की दूरी से पता चल जाता है कि दूसरा हाथी कहां पर है, इसलिए आवाज के आधार पर तथा जानवरों के बिहेवियर को देखते हुए नई टेक्नोलॉजी विकसित की जा रही है।

जानवरों का साइंस ऑफ परसेप्शन बहुत मजबूत, इसलिए नई टेक्नोलॉजी से जल्द सुलझेगी समस्या

उदय बोरवणकर ने कहा कि जानवरों का साइंस ऑफ परसेप्शन बहुत ज्यादा मजबूत होता है, जबकि हमारा कमजोर। इसलिए हम नई टेक्नोलॉजी के माध्यम से इस समस्या को जल्द सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं उन्होंने बताया कि भारत सरकार की आत्मनिर्भर भारत योजना के तहत रेलवे की तकनीकी क्षमताओं का विकास लगातार हो रहा है। मधुप श्रीवास्तव, डायरेक्टर, आरडीएसओ लखनऊ ने बताया कि कवच 4.0 के माध्यम से दो स्टेशनों के बीच कम्युनिकेशन को और बेहतर बनाने पर काम किया जा रहा है और वर्तमान में इसका परीक्षण रेलवे जोनल स्तर पर चल रहा है। इस दौरे के दौरान मीडिया दल को एयर ब्रेक लैबोरेटरी, सिग्नल लैब और आधुनिक स्वदेशी रेल सिग्नलिंग तकनीकों की जानकारी दी गई। मधुप श्रीवास्तव ने कवच 4.0 की तकनीकी विशेषताओं पर प्रकाश डाला, जबकि शमीम अहमद ने तेजस और वंदे भारत ट्रेनों के ब्रेकिंग सिस्टम के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

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