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Holi 2025 : होली पर शाहजहांपुर की अनोखी परंपरा, जब ‘लाट साहब’ पर होती है जूतों की बरसात, आप भी जान लीजिए उत्सव का अनोखा संगम

शाहजहांपुर। पूरे देश में होली का जश्न अपने अनूठे अंदाज में मनाया जाता है। सड़कों पर हजारों लोगों का हुजूम, बीच में गुजरती एक भैंसागाड़ी और उस पर सवार ‘लाट साहब’ पर जूतों की बरसात… यह अनोखा नजारा हर साल होली के मौके पर उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में देखने को मिलता है। होली पर ‘लाट साहब’ के जुलूस की यह परंपरा शाहजहांपुर में सालों से चली आ रही है।

जुलूस के दौरान लाट साहब को पूरे शहर में घुमाया जाता है और अंत में बाबा विश्वनाथ मंदिर ले जाया जाता है, जहां उनसे विधिवत पूजा-अर्चना करवाई जाती है। यह परंपरा अब न केवल शाहजहांपुर बल्कि पूरे देश में मशहूर हो चुकी है।

क्या है ‘लाट साहब’ परंपरा?

‘लाट साहब’ परंपरा का संबंध अंग्रेजी शासनकाल से बताया जाता है। ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में गवर्नर और उच्च अधिकारियों को ‘लाट साहब’ कहा जाता था। माना जाता है कि ब्रिटिश अधिकारियों के अत्याचारों के खिलाफ जनता के आक्रोश को प्रकट करने के लिए यह परंपरा शुरू हुई थी। लोग प्रतीकात्मक रूप से एक व्यक्ति को ‘लाट साहब’ बनाकर उसकी धज्जियां उड़ाते हैं और होली के रंग में सराबोर होकर उसे जूतों से मारते हैं।

यह जुलूस पूरे शहर से होकर गुजरता है और हजारों की संख्या में लोग इसमें शामिल होते हैं। इस दौरान हंसी-मजाक, नाच-गाना और रंग-गुलाल की बौछार से माहौल पूरी तरह होलीमय हो जाता है। यह परंपरा होली के दूसरे दिन ‘दुल्हेंडी’ पर निभाई जाती है।

परंपरा की शुरुआत और ऐतिहासिक महत्व

स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, इस परंपरा की जड़ें 18वीं सदी में नवाब बहादुर खान के शासनकाल तक जाती हैं। कहा जाता है कि उनके वंशज नवाब अब्दुल्ला खान के शासनकाल में 1729 में हिंदू-मुस्लिम समुदाय के लोग एक साथ उनके महल में होली खेलने गए थे। नवाब ने भी उनके साथ रंग खेला और फिर मजाकिया अंदाज में उन्हें ऊंट पर बिठाकर पूरे शहर में घुमाया गया। तभी से यह परंपरा शाहजहांपुर में शुरू हुई, जो आज तक जारी है।

कैसे मनाई जाती है यह अनोखी होली?

होली के दिन शहर के किसी व्यक्ति को ‘लाट साहब’ बनाया जाता है। वह अंग्रेजों की तरह सफेद कपड़े पहनता है और सिर पर टोपी लगाता है। उसे एक भैंसा गाड़ी पर बिठाया जाता है और शहर के प्रमुख चौकों से होते हुए यह जुलूस गुजरता है। लोग उसके चारों ओर नाचते-गाते चलते हैं और जूते मारने की रस्म निभाते हैं।

हालांकि, यह सब एक हल्के-फुल्के मजाक और मस्ती के साथ किया जाता है। ‘लाट साहब’ बनने वाला व्यक्ति भी इसे उत्साह से स्वीकार करता है और इसे अपमानजनक नहीं बल्कि मनोरंजन का हिस्सा मानता है।

कोतवाली में सलामी और लेखा-जोखा

जुलूस के दौरान एक और रोचक परंपरा निभाई जाती है। जब ‘लाट साहब’ की सवारी शहर के मुख्य चौक से गुजरती है, तो इसे स्थानीय पुलिस कोतवाली के अंदर सलामी दी जाती है। इसके बाद ‘लाट साहब’ को कोतवाल के सामने ले जाया जाता है, जहां उनसे पूरे वर्ष का प्रशासनिक लेखा-जोखा मांगा जाता है। कोतवाल प्रतीकात्मक रूप से ‘लाट साहब’ को नजराना भेंट करते हैं। यह सब एक नाटकीय अंदाज में किया जाता है, जिसे देखने के लिए हजारों लोग उमड़ते हैं।

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