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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला : राष्ट्रपति के लिए पहली बार तय हुई डेडलाइन, भेजे गए बिल पर तीन महीने के भीतर हो निर्णय

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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला : राष्ट्रपति के लिए पहली बार तय हुई डेडलाइन, भेजे गए बिल पर तीन महीने के भीतर हो निर्णय
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट किया है कि देश के राष्ट्रपति को भी राज्यपाल की ओर से भेजे गए बिल पर एक तय समयसीमा के भीतर निर्णय लेना होगा। अब राष्ट्रपति को ऐसा कोई विधेयक मिलने के तीन महीने के भीतर उस पर फैसला देना अनिवार्य होगा। यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 201 के अंतर्गत दिया गया है।

तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल मामला बना मिसाल

यह निर्णय 8 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए उस फैसले का विस्तार है, जिसमें तमिलनाडु सरकार और राज्यपाल आरएन रवि के बीच लंबित विधेयकों को लेकर विवाद पर सुनवाई हुई थी। इस मामले में अदालत ने स्पष्ट किया था कि राज्यपाल को विधानसभा द्वारा पास किए गए किसी भी बिल पर अधिकतम एक महीने के भीतर फैसला देना होगा।

अनिश्चित काल के लिए लंबित नहीं हो सकता बिल

सुप्रीम कोर्ट ने 11 अप्रैल को सार्वजनिक किए गए आदेश में अनुच्छेद 201 का हवाला देते हुए कहा कि राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के पास भेजे गए विधेयकों पर राष्ट्रपति के पास पॉकेट वीटो या पूर्ण वीटो का अधिकार नहीं है। यानी राष्ट्रपति अनिश्चितकाल तक किसी बिल को लंबित नहीं रख सकते।

चार मुख्य बिंदु जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने दिया स्पष्ट निर्देश

  1. राष्ट्रपति को लेना होगा निर्णय- अगर कोई राज्यपाल विधानसभा द्वारा पारित विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ भेजते हैं, तो राष्ट्रपति को उस बिल पर या तो स्वीकृति देनी होगी या अस्वीकृति देनी होगी। बिल को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता।
  2. राष्ट्रपति के निर्णय की हो सकती है न्यायिक समीक्षा- कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति का निर्णय न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत आएगा। अगर राष्ट्रपति द्वारा लिया गया निर्णय केंद्र सरकार की अनुचित प्राथमिकता या दुर्भावना के आधार पर प्रतीत होता है, तो अदालत उसमें हस्तक्षेप कर सकती है।
  3. देरी पर देना होगा कारण- कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा भेजे गए किसी भी बिल पर तीन महीने के भीतर निर्णय लेना होगा। यदि इसमें विलंब होता है, तो उसके पीछे के कारण स्पष्ट करने होंगे।
  4. बार-बार वापस नहीं भेज सकते बिल- यदि राष्ट्रपति कोई विधेयक पुनर्विचार के लिए राज्य विधानसभा को भेजते हैं और विधानसभा उसे फिर से पारित कर देती है, तो राष्ट्रपति को उस बिल पर अंतिम निर्णय लेना होगा। वह विधेयक को बार-बार वापस नहीं भेज सकते।

राज्यपाल के पास नहीं होता है वीटो पॉवर

तमिलनाडु मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के अधिकारों की भी स्पष्ट व्याख्या की। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि राज्यपालों के पास वीटो पॉवर नहीं है। राज्यपाल को राज्य सरकार की मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुरूप कार्य करना होता है।

तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि पर विशेष टिप्पणी

तमिलनाडु सरकार द्वारा दायर याचिका में कहा गया था कि राज्यपाल आरएन रवि ने कई आवश्यक विधेयकों को अनावश्यक रूप से लंबित रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर टिप्पणी करते हुए राज्यपाल के रवैये को मनमाना और कानून के खिलाफ बताया। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को एक संवैधानिक पद पर रहते हुए विधानसभा के कार्यों को सहयोग देना चाहिए, न कि उन्हें बाधित करना। ये भी पढ़ें- तुलसी गाबार्ड ने कहा- पूरी तरह बैलेट पेपर से हो वोटिंग; अमेरिका में छिड़ी बहस, भारत में कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर साधा निशाना
Wasif Khan
By Wasif Khan

फिलहाल जुलाई 2024 से पीपुल्स अपडेट में सब-एडिटर हूं। बीते 3 वर्षों से मीडिया में सक्रिय हूं। 12वीं म...Read More

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