
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश में की गईं उन टिप्पणियों पर रोक लगा दी, जिसमें कहा था कि नाबालिग लड़की के ब्रेस्ट पकड़ना और उसके पायजामे के नाड़े को खींचना रेप या अटेम्प्ट टु रेप के दायरे में नहीं आता। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश का स्वत: संज्ञान लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस फैसले में संवेदनशीलता की कमी दिखाई देती है।
संवेदनशीलता की कमी : SC
जस्टिस बीआर गवई और एजी मसीह की बेंच ने बुधवार को इस केस पर सुनवाई की। बेंच ने कहा कि उसे यह कहते हुए तकलीफ हो रही है कि हाईकोर्ट के आदेश में की गईं कुछ टिप्पणियां पूरी तरह से असंवेदनशील और अमानवीय दृष्टिकोण वाली हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमने हाईकोर्ट के आदेश को देखा है। हाईकोर्ट के आदेश के कुछ पैराग्राफ जैसे 24, 25 और 26 में जज द्वारा संवेदनशीलता की पूर्ण कमी को दर्शाता है। इसलिए हम उक्त पैराग्राफ में की गई टिप्पणियों पर रोक लगाते हैं। ऐसा भी नहीं है कि फैसला जल्द में लिया गया है। इस मामले में सुनवाई पूरी होकर निर्णय रिजर्व होने के 4 महीने बाद निर्णय सुनाया गया है।
केंद्र और यूपी सरकार को नोटिस जारी
बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 17 मार्च के आदेश से संबंधित मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई शुरू की गई। सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल और अटॉर्नी जनरल को सुनवाई के दौरान कोर्ट की सहायता करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम केंद्र, उत्तर प्रदेश को नोटिस जारी करते हैं। कोर्ट ने कहा कि हम दो हफ्ते बाद मंगलवार को इस पर सुनवाई करेंगे।
क्या है मामला ?
दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 17 मार्च को अपने एक आदेश में कहा था कि किसी लड़की के निजी अंग पकड़ लेना और ‘पायजामे’ का नाड़ा खींचना बलात्कार के अपराध के दायरे में नहीं आता, लेकिन इस तरह के अपराध किसी भी महिला के खिलाफ हमले या आपराधिक बल के इस्तेमाल के दायरे में आते हैं। फैसला देने वाले जज जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने 11 साल की लड़की के साथ हुई इस घटना के तथ्यों को रिकॉर्ड करने के बाद यह कहा था कि इन आरोप के चलते यह महिला की गरिमा पर आघात का मामला तो बनता है। लेकिन इसे रेप का प्रयास नहीं कह सकते।